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भगत सिंह
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“यदि बहरों को सुनाना है तो आवाज़ को बहुत जोरदार होना होगा”

“…व्यक्तियो को कुचल कर , वे विचारों को नहीं मार सकते।”

“निष्ठुर आलोचना और स्वतंत्र विचार ये क्रांतिकारी सोच के दो अहम् लक्षण हैं।”

“महान साम्राज्य ध्वंस हो जाते हैं पर विचार जिंदा रहते हैं।”

Tuesday, January 7, 2025

कहानी : आशीष की चूड़ियां , लेखिका - सुधा गोयल , कृष्णानगर डा.दत्ता लेन, बुलंदशहर

 कहानी : आशीष की चूड़ियां

   
      "उ...ई....चू....ड़ी...."विसवा चूड़ियों का गट्ठर पीठ पर लादे आवाज लगाता तो घरों की ड्योढ़ी के बाहर कितने ही बोल खनक पड़ते। चूड़ियां खनकने लगतीं , घूंघटों  की ओट से इशारे होने लगते। कुंवारी लड़कियां सहन में आ खड़ी होती और ऊंची आवाज में चिल्लाती-" ए विसवा पहले ही इधर आ। भाभी को माय के जाना है।"
     "नहीं विसवा पहले इधर आ ,हमारा घर पहले पड़ता है।"

      "विसवा, जरा घर आना।मुई भैंस ने लात मार दी। सारी चूड़ियां खनखना कर टूट गई।"

      अकेला विसवा होता और उसके पीछे ढ़ेरों आवाजें होती ।विसवा असमंजस में पड़ जाता कि पहले किधर जाए। वह जानता था लड़कियां और बहुएं सारा सामान निकलवा कर खुलवा देती हैं। फिर लेंगे दो आने का आलता, आठ आने की बिंदी, एक नाखूनी गिलट की माला, चार आने के मोतियों के झुमके या फिर' तेज बहुत है'- कहकर खाली ही टरका  देंगीं। कितने नखरे हैं इन लड़कियों के।मन ही मन खीजता और सोचता पर प्रकट रूप से कभी भी न खीजता। लड़कियों की भोली नजर और स्फटिक  सी साफ हंसी उसे विभोर कर देती।

        अरे यह तो चिड़िया है इनके चहकने के दिन हैं ।खूब जी भर कर चहक लें ।क्या पता किस आंगन में जाकर बसेरा कर लें और वह इस चहक ने को सुनने को भी तरस जाए।

      कितनी ही बेटियां बहू बनकर ससुराल की चौखट पर गई तो वहीं जाकर बस गयीं ।कभी-कभी तीज त्योहार पर मिलेंगी तो पूछेंगी -'कैसे हो विसवा?' उसे सुनकर बड़ा दुख होता है ।ये चिड़िया पिंजरे में कैदी जैसी बोली कैसे सीख गई। विसवा के  सामान की छेड़छाड़ उठा पटक सब बंद। न सामान देखने की उत्सुकता और ना खरीदने का उत्साह ।जैसे साठ साल की बूढी हो गई हो। विसवा की आत्मा तक लरज उठती। वह जल्दी-जल्दी निःश्वास खींच कर वहां से चल देता।

        सबसे पहले वह गांव की बुढ़ियो की आवाज सुनता। वे मोटी और पक्के कांच की चूड़ियां पहनती। छोटी-छोटी कलाइयों में गढ़ती सी ।विसवा उनकी पसंद जानता था। एक लच्छा निकालता और चुपचाप चूड़ी पहना देता। न मोल न भाव। वे जो कुछ दे देती चुपचाप जेब में डाल देता ।चलते-चलते अम्मा राम राम, काकी पैर छुए ,चाची सलाम कहता और वे बूढ़ियां विसवा को आशीषों से लाद देतीं।

        विसवा मन ही मन हंसता। गांव की बड़ी बूढ़ियों के आशीष कभी नहीं फलेंगे। ना विसवा का घर बार होगा ना फले फूलेगा ।बस ले देकर एक बूढी मां ही तो है जो हरदम खाट में पड़ी खांसा करती है। ढेरों बलगम के साथ कभी-कभी खून भी उगल देती है ।डॉक्टर ने कहा था कि शहर में जाकर इलाज कराए। टीवी हो गई है।

         विसवा सोचता- टीवी जैसे रोग तो राजा महाराजाओं के होते थे विसवा की झोपड़ी में कैसे आ गए। यह बात नहीं की विसवा अपनी मां को प्यार नहीं करता था इसी से शहर इलाज को नहीं ले गया पर विसवा मजबूर था। बीमार बूढी मां की सेवा करता, टिक्कर सेंकता या गली-गली चूड़ियां बेचता। तब कहीं थोड़ी सी दवा दारू और रोटियां का जुगाड़ कर पाता।

          मोहल्ले टोल वाले कहते विसवा ब्याह कर ले घर में खटने से तो बच जाएगा। मां भी कई बार कह चुकी थी पर विसवा अपनी स्थिति अच्छे प्रकार जानता था। उसकी कमाई में किसी तीसरे पेट की गुंजाइश नहीं थी। ब्याह के बाद एक क्या कई पेट बढ़ जाते ,विसवा सोचता और मन मसोस कर रह जाता। पेट भरा हो तो तन की आग जागती है, पर विसवा पेट की आग के  आगे तन की आग को भुला बैठा था।

       गांव में कहीं ब्याह शादी मुंडन या जचकी होती विसवा की टेर लगती ।विसवा सारा सामान सहेज पहुंच जाता। नगद रूपयों के साथ मिठाई पकवान या गुड आटा भी मिलता। फसल पर अनाज से हिस्सा मिलता। बस इसी तरह विसवा की जिंदगी घिसट रही थी ।पहले बापू यह काम करते थे। विसवा पंद्रह साल का रहा होगा तभी बापू हैजे में चल बसे और चूड़ियों का गठ्ठर विसवा के कंधे पर आ गया। विसवा के लिए  यह काम नया नहीं था ।अक्सर बापू के साथ-साथ एक गट्ठर उठाकर वह भी गली-गली घूमा करता था।

        एक बार ठोकर खाकर लाख संभालने पर भी खुद को ने संभाल सका और चूड़ियों के गठ्ठर सहित गिर गया। सारी चूड़ियां टूट गई। बापू ने छड़ी से खूब मारा और दो दिन तक रोटी नहीं दी। मां चुपचाप देखती रही थी। बापू के सामने बोलने की उसमें हिम्मत न थी ।जब भी विसवा वह मार याद करता है स्वतः ही मुंह से सीत्कार निकल जाती है मानो चोट अभी उसके जख्म पिरा रही है।

       आज पूरे पंद्रह साल हो गए ।हर गली हर घर से वह अच्छे प्रकार परिचित है कि किस घर में लड़की सयानी हो रही है और किस घर में लड़के के दाढ़ी मूंछें उग रही है विसवा को सब की खबर रहती है। बिरमा टोले और अहीर टोले में कई रिश्ते तो स्वयं उसके ही करवाए हैं। उन घरों में विसवा की बड़ी आव भगत होती है।

         विसवा का हाथ इतना दक्ष है कि मजाल कोई चूड़ी चटक जाए। विसवा पहले हाथ को दबाकर परख कर लेता है।फिर चूड़ियां पहनाता है ।चूड़ियां भी जैसे उसके इशारे पर चलती हैं ।कहीं किवाड़ के पीछे से, कहीं घूंघट की ओट से गोरे गोरे हाथ उसके आगे बढ़ते। विसवा चूड़ियां फैलाता ।पसंद सास या ननद की होती। बहुएं  चूड़ियां पहनती। नाजुक नरम कलाइयां सज उठतीं । विसवा एक-एक चूड़ी आशीष की अपनी तरफ से पिरो देता। कोई बड़ी-बूढी तेरह चूड़ियों पर एतराज करती तो विसवा अपनी तरफ से चौदह कर देता। बहूएं चूड़ियां पहनकर साड़ी के पल्लू से थान छूकर माथा नवाती और विसवा का रटा रटाया वाक्य मुंह से निकलता- "ईश्वर तुम्हें खुश रखे खूब फलें फूलों"

         इस क्रम में थोड़ा व्यवधान आया था फूलो के आने से। विसवा की शांत झील सी जिंदगी में जैसे कोई कंकर आकर गिर पड़ा हो और हलचल पैदा कर दी हो। सरवतिया लोहार की पत्नी फूलवती नाम के साथ-साथ शक्ल सूरत में भी फूल सी है ।विसवा ने भी सुना है पूरे गांव में चर्चा है जबकि सरबतिया काला भुजंग किसी देव दानव सा है ।अंधेरे में देखकर किसी भी का यमराज का भ्रम होने लगे।

        सरबतिया के आगे पीछे भी कोई नहीं था।धौंकनी फूंक फूंक कर चार पैसे इकट्ठे कर लिए। एक झोपड़ी डलवा ली और किसी अनाथाश्रम से फूलवती को ले आया ।वह सबको यही बताता है कि उसकी बाकायदा शादी हुई है ।एक साथ पंद्रह लड़कों की भांवरें पड़ी थी बिल्कुल सरकारी तरीके से ।कोई मंत्री भी आए थे। सब उसको सरकारी फूलो कहते हैं ।गांव के लिए फूलो का व्यक्तित्व बेहद अजनबी था। अतः  उत्सुकता बश सभी बहू बेटियां जाकर फूलो को देख आईं थीं  उसका भी मन करता की एक बार सरकारी दुल्हन को देखें। चर्चे तो बहुत सुने हैं पर फूलो हर वक्त हाथ भर का घूंघट लगाए रखती। गोरे चिट्टे नरम हाथ आलता लागे छम छम करते पांव ,कमर पर लटकती लंबी चोटी दूर से ही विसवा ने देखी थी।

       घर में कोई सास ननंद तो थी ही नहीं ।उस दिन विसवा ने आवाज लगाई"…...उ.....ई....चू......ड़ी..….."तो फूलो ने इशारे से उसे बुला लिया। विसवा ने सामान का ढेर लगा दिया फूलो ने ढ़ेरों चीजें खरीदीं फिर मनचाहे रंग की चूड़ियां पहनी। इस बीच फूलो बिल्कुल भी नहीं बोली। बस संकेतों से बताती रही।

          फूलों के नरम हाथ हाथ में लेते ही विसवा को जैसे करंट लग गया ।सारा शरीर झनझना उठा। पहले कभी भी उसके साथ ऐसा नहीं हुआ था । हड़बड़ी  में उसने दो की जगह चार आशीष की चूड़ियां पहना दी। एक खनकती हुई मदिर हंसी उसके कानों में घंटियां सी बजा गई ।फूलो ने पांच का नोट निकालकर चुपचाप गट्ठर पर रख दिया ।विसवा जेब से रेज़गारी निकाल कर गिनने लगा ।फूलो ने इन्कार का संकेत किया। विसवा वह नोट लेकर चला आया। उस दिन उसकी खूब बिक्री हुई। उस पांच के नोट को विसवा बहुत दिन तक संभाल कर रखे रहा।

       विसवा जब भी चूड़ियां बेचने निकलता फूलो के घर के सामने से आवाज लगाता अवश्य निकलता। उसकी आंखें किवाड़ों की दरारों के पीछे खड़ी फूलो को देखने का असफल सा प्रयास करती । उसका मन कहता कि किवाड़ के पीछे फूलो झांक रही है। बस इतना सोचते ही उसकी मन सतरंगी घोड़े पर सवार हो हवा से बातें करने लगता।

         फूलो को जब जरूरत होती इशारे से बुला लेती। विसवा उत्साह में भरकर उसके सामने सारे सामान का ढेर लगा देता। मन करता अपनी पसंद की एक-एक चीज चुनकर फूलो को दे दे और फिर देख की उसकी अपनी पसंद फूलो पर कितनी फबती है। पर मन की बात मन में ही रह जाती  फूलो मनपसंद समान चुन लेती। बस घूंघट की ओट से एक खनकती हंसी सुनाई पड़ती। फूलो आंचल रख चूड़ियों को शीश नवाना ने जानती थी। अनाथों की तरह पली थी। गांव के नियम कानून उसे क्या पता। जितना सरबतिया ने बता दिया था उतना ही उसे मालूम था। सरबतिया ने कहा था की घूंघट लगाकर रहना है। फूलो हाथ भर का घूंघट खींचे रहती है। मोहल्ले की तमाम औरतों कुएं पर पानी भरने जाती पर सरबतिया स्वयं पानी भरकर रख जाता ।फूलो दिन भर घर में अकेली रहती।

         सरबतिया जब पानी भरने जाता टोले की औरतें आंचल मुंह में दबा मंद मंद मुस्काती। कोई कोई फुसफुसा कर कह भी देती लो भाई आ गया जोरु का गुलाम या कोई कोए की चोंच में अनार की कली। सरबतिया इन सब बातों को सुनकर भी अनसुना कर देता। चुपचाप पानी भरता रहता। फूलो उस के लिए रोटी पकाती ,घर साफ करती , उसके कपड़े धोती। थका हारा घर लौटता तो बदन दबाती। अगली सुबह फिर दुकान जाते समय गमछे में रोटी और सब्जी बांधकर थमा देती। सरबतिया  दुकान खोलता, आग सुलगाता, भट्टी गरमाता और फिर खटपट शुरू हो जाती।

          फूलों दिन भर घर में अकेली रहती है तभी विसवा की आवाज सुन किवाड़ों की ओट से झांकने लगती।  विसवा का भ्रम विश्वास में बदल रहा था। वह जब भी शहर जाता और नए डिजाइन की चूड़ियां चोटिला, रिवन  और गिलट के सफेद पीले जेवर लेकर आता ।सबसे पहले फूलों के घर पहुंचता और फिर गली-गली आवाज लगाता घूमता।

         विसवा अपने दिल के आगे मजबूर था। एक अनचाही उमंग उसे खींच कर ले जाती ।उसे पाने की चाह कभी भी विसवा के मन में बलवती न हुई। फूलों एक महकता फूल थी जिसकी खुशबू को दूर से सूंघा जा सकता है। जिसके रूप को आंखों ही आंखों में पिया जाता है। फूल तोड़कर मसले जाने के लिए नहीं होते। तभी तो विसवा बड़े आहिस्ते से फूलो की कलाई पकड़ कर हाथ दबाता और धीरे-धीरे चूड़ियां पहना देता ।जोर से पकड़ने पर उसे भय लगता कहीं कोई पंखुड़ी कुम्हला ना जाए।

      पंद्रह दिन बाद विसवा गांव लौटा था ।पिछले दिनों ननिहाल में कोई गमी हो गई थी ।उसे मजबूरन मां को पड़ोसियों के सहारे छोड़कर जाना पड़ा था। पास का पैसा भी समाप्त हो गया था ।जब काम ही नहीं किया तो पैसा कहां से आता। आते ही विसवा  अपना गट्ठर उठा और आवाज लगाता फूलों के घर के सामने पहुंच गया।

        गट्ठर उतार कर जमीन पर रखा। सारा सामान खोल खोल कर सजाने लगा ।"आज क्या लोगी?"  तभी दरवाजे के अंदर से दो गोरे-गोरे हाथ आगे बढ़े। सूनी कलाइयां देख विसवा स्तब्ध रह गया। फूलो मुंह खोले सामने खड़ी थी। ना माथे पर टिकली ना मांग में सिंदूर खाली आंखें उलझे बाल ऐसे रूप की तो विसवा ने कल्पना भी न की थी। उठे हाथ वहीं रुक गए।" रुक क्यों गए विसवा, आज आशीष की चूड़ियां नहीं पहनाओगे?" मुंह में आंचल ठूंस किसी प्रकार अपने रुलाई पर काबू पाती फूलो अंदर की तरफ भाग गई
        विसवा को जैसे यकीन ना हुआ। उसके हाथ और पांव को काठ मार गया। इतना कुछ कब और कैसे हो गया उसे पता ही ना चला। बड़ी मुश्किल से उसने गट्ठर बांधा और लड़खड़ाते पैरों से लौट पड़ा। आवाज लगाकर चूड़ी बेचने की शक्ति अब उसमें न थी। फूलो का वैधव्य बार-बार उसकी आंखों में घूम रही थी। विसवा हाट से होकर गुजरा तो करीम काका ने टोका-" इतने दिन कहां रहे बिसवा। यहां तो बहुत कुछ घट गया। आतंकवादियों ने एक दिन निहत्थे लोगों पर गोलियां चला दी और भाग गए। कई घर उजड़ गए। सरबतिया भी मारा गया। बेचारा दुकान को ताला लगा रहा था।"

          विसवा की समझ में सब कुछ आ गया। उसके बाद विसवा ने चूड़ी बेचने का धंधा ही बंद कर दिया। मां को लेकर शहर चला गया।
       काफी समय निकल गया। फुल्लो अभी एक आस के सहारे जिंदा थी । किवाड़  की ओट से झांक कर देखती रहती है। उसके कान आवाज सुनने को तरस गए थे ।उसे पूरा यकीन था कि एक दिन विसवा लौटेगा फूलो की अभिलाषा भी पूरी हुई। विसवा अपने गांव लौटा था। उसकी पीठ पर चूड़ियों का गट्ठर न था बल्कि हाथ भर का घूंघट काढ़े छम छम करती हुई कोई तरुणी पीछे-पीछे आ रही थी।
        फूलो किवाड़ों की ओट से झांक रही थी। तभी कोई पास से कहता हुआ गुजर गया कि विसवा ने शादी कर ली है। मेहरिया को लेकर गांव आया है। फूलो की आंखों से दो बूंद आंसू चूकर सूनी कलाइयों पर गिर पड़े जिन्हें अभी तक आशीष  की चूड़ियों का इंतजार था ।अगले दिन सब ने सुना के फूलो फिर नारी आश्रम में चली गई है।

लेखिका  
सुधा गोयल
290-ए, कृष्णानगर डा.दत्ता लेन, बुलंदशहर -203001

जश्न ए धमाका सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रतिभागी हिमालयन सुपरस्टार टाइटल अवार्ड से सम्मानित : कांगड़ा :- हिमाचल प्रदेश

 

आपना कांगड़ा एंटरटेनमेंट के बैनर तले हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी जश्न ए धमाका नव वर्ष पर सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया , जिसमें हिमाचल प्रदेश और बाहर से आए हुए कलाकारों ने अपने हुनर के जलवे दिखाए और आए हुए दर्शकों को मंत्रमुग्ध किया ।
इस अवसर पर टैलेंट का महासंग्राम 2024 के विजेताओं को हिमालयन सुपरस्टार टाइटल अवार्ड देकर आपना कांगडा एंटरटेनमेंट संस्था के अध्यक्ष सुमित गुप्ता ने सम्मानित किया।
कार्यक्रम का आयोजन यात्री सदन में किया गया । मुख्य अतिथि वीरेंद्र चौधरी विशेष अतिथि संजीव पटियाल , नरेंद्र  त्रेहन ने दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया। कार्यक्रम में रंगारंग प्रस्तुतियां दी गईं , जिसमें मुख्यतः भारतीय संस्कृति को मंत्र उच्चारण के द्वारा अदिति अपराजिता और उमा शर्मा के द्वारा प्रस्तुत किया गया। इस अवसर पर लव कुश और राम लक्ष्मण की भी सुंदर झांकियां निकाली गईं । इस अवसर पर संस्था की ब्रांड एंबेसडर प्रकृति कौंडल मुख्य रूप से उपस्थित रहीं , जबकि स्टेट ब्रांड प्रमोटर आरबी सोनी , वेदांशी कौल, प्रेजी शर्मा , जिला बिलासपुर की ब्रांड प्रमोटर रिया शर्मा , भवारना ब्लॉक की ब्रांड प्रमोटर सानिया ठाकुर , कोलकाता स्टेट की ब्रांड प्रमोटर सृजनी दास विशेष रूप से उपस्थित रहे । इस अवसर पर हिमाचल प्रदेश के नंबर वन झांकी कलाकार टिंकू बिहान और देशराज राणा जी को सम्मानित किया गया। इस अवसर पर युवा कवि डोगरा , मिस भारत रशिन शर्मा , मिसेज रिपब्लिक इंडिया रुशल बिग , मिस्टर हरियाणा साहिल खान , प्रोड्यूसर डायरेक्टर एकलव्य सेन , सुप्रसिद्ध हिमाचली लोक गायक सौरभ शर्मा  , आकांक्षा मेहरा गायिका , अंजलि माडल  के अलावा और भी गणमान्य उपस्थित रहे । समाजसेवी पंकज कुमार उर्फ पंकू में भी कार्यक्रम को सफल बनाने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। आए हुए सभी मेहमानों ने कांगडी धाम का भी आनंद लिया।
हिमाचल प्रदेश के सुप्रसिद्ध एंकर विजय कुमार जी , सुदेश सहोत्रा जी , चंद्र भारद्वाज जी , असीम जी , संदीप चौधरी जी ने इस अवसर पर अपनी जादुई शब्दों से कार्यक्रम में संयम बांधे रखा ।

Friday, June 30, 2023

सेन्गोल : शासक पर नियंत्रण का प्रतिक || बिमल तिवारी "आत्मबोध" देवरिया उत्तर प्रदेश

 


सेन्गोल : शासक पर नियंत्रण का प्रतिक 

आत्मबोध। ब्रह्मा ने सृष्टि की उत्पति की।पालन का काम विष्णू ने किया। संहार अर्थात विलय का काम शिव के जिम्मे गया।प्रजापति ने राजा बनके व्यवस्था सम्भाला। प्रजापति को कण्ट्रोल करने के लिए शिव ने अपना दंड ब्रह्मा विष्णू के कहने से प्रजापति के सामने रख दिया। जिससे प्रजापति न्याय और धर्म पुर्वक राज करे। शिव ने अपने मत के प्रचार प्रसार के लिए ऋषी अगस्त को अपने पुत्र कार्तिकेय के साथ सुदूर दक्षिण में भेजा। तब प्रश्न था की, कैसे लोग हमें आपका प्रतिनिधि मानेंगे और कैसे कार्तिकेय न्यायपुर्ण व्यवस्था बनाये रखेंगे। तब शिव ने अपना दंड प्रजापति से लेकर अगस्त को दे दिया की इससे लोग आप लोगों को मेरा प्रतिनिधि मानेगे और जब मेरे मत का राज स्थापित हो जाए तो आप कार्तिकेय को इसे सौप देंगे, जिससे कार्तिकेय कभी उदंड नही होगे। मनमाना नही करेंगे न्याय और समानता के अनुसार राज करेंगे। ऐसा हुआ भी। यह पौराणिक बाते है।

प्राचीन भारत में राजा अपने साथ में एक प्रतीकात्मक छड़ी रखते थे। इसे राजदंड कहा जाता है। यह जिसके पास भी होती थी, पूरे राज्य का वास्तविक शासन उसी के आदेशों से चलता था। इसीलिए इसे राजदंड कहा जाता था। धार्मिक गुरु भी इसे धारण करते थे। वर्तमान में भी इसे अधिकतम धर्मगुरु धारण करते हैं। हिंदू धर्म के चारों प्रमुख शंकराचार्यों सहित ईसाई धर्म के प्रमुख पोप भी ऐसे ही एक राजदंड को साथ रखते हैं जो उनकी शक्ति और उनकी सत्ता का प्रतीक है। भारतीय शास्त्रों के अनुसार इसे राजा-महाराजा सिंहासन पर बैठते समय धारण करते थे।पूरे इतिहास में, सेंगोल का उपयोग विभिन्न साम्राज्यों जैसे गुप्त साम्राज्य (320–550 ईस्वी), चोल साम्राज्य (907–1310 ईस्वी), और विजयनगर साम्राज्य (1336–1946 ईस्वी) द्वारा किया गया है। यहां तक कि मुगल और ब्रिटिश सरकारों ने भी सेंगोल को अपनी शक्ति और अधिकार के प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया। सेंगोल' तमिल शब्द 'सेम्मई' (नीतिपरायणता) व 'कोल' (छड़ी) से मिलकर बना है। ‘सेंगोल’ शब्द संस्कृत के ‘संकु’ (शंख) से भी आया हो सकता है। सनातन धर्म में शंख को बहुत ही पवित्र माना जाता है। मंदिरों और घरों में आरती के समय शंख का प्रयोग आज भी किया जाता है। तमिल राजाओं के पास ये सेंगोल होते थे जिसे अच्छे शासन का प्रतीक माना जाता था। शिलप्पदिकारम् और मणिमेखलै, दो महाकाव्य हैं जिनमें सेंगोल के महत्त्व के बारे में लिखा गया है। विश्वप्रसिद्ध नीति ग्रंथ तिरुक्कुरल में भी सेंगोल का उल्लेख है।

हिंदू सभ्यता का इतिहास कागज से ज्यादा पत्थरों में लिखा गया है। हम्पी के विरुपाक्ष मंदिर में नटराज के रूप में खड़े शिव की पत्थर की मूर्ति है। इस मूर्ति का निर्माण 8वी शताब्दी में हुआ है।जिसमें नटराज शिव के बाएं हाथ में राजदंड (सेनगोल) साफ दिखाई दे रहा है। सेंगोल के ऊपर नंदी विराजमान हैं। इस मूर्ति से देखा जा सकता है कि राजदंड या धर्मदंड या सेंगोल न केवल राजाओं द्वारा धारण किया जाता है, जिसे आदिपुरुष शंकर ने बनाया और धारण किया है। धारण का मतलब "विचार जो सभी को गले लगाता है", अर्थात हर समय दया और शासन का सभी प्राणियों की सुध लेने का प्रतीक है। यह दंड भगवान शिव/विष्णु और उनके प्रतिनिधि माने जाने वाले सम्राट की अबाधित ऐश्वर्य और संप्रभु शक्ति का प्रतीक है। प्रजा का पालन करते हुए यह धार्मिक दंड समय-समय पर राजा को अपनी प्रजा के प्रति कर्तव्य और राजधर्म के प्रति जागरूक करता है।

           दक्षिण भारत मे चोल राजाओं ने अपने सत्ता के हस्तांतरण के प्रतिक रुप में इस सेन्गोल को अपनी परम्परा में शामिल कर लिया। कहा जाता है की यह प्रतिक चिन्ह जिस राजा के पास रहा, वह बहुत शान्ति और सुख पुर्वक राज किया। कभी उदंड नही हुआ। अब प्रश्न है की उत्तर भारत मे ऐसी परम्परा क्यो नही रही ? तो उत्तर भारत में भी ऐसी परम्परा थी। मगर उत्तर भारत में इस्लामी आक्रांताओ ने इतना आक्रमण किया की हमारी धर्म, संस्कृति, सभ्यता, परम्परा लगभग खत्म सी हो गयी। मगर दक्षिण इन सब आपदाओं से बचा रहा। हजारों साल की परम्पराए आज भी दक्षिण के मंदिर और रिवाजो मे आज भी चली आ रही है।

          देश को जब अजादी मिलने वाली थी। तब माऊंटबेटन ने नेहरु से चर्चा किया की सत्ता हस्तांतरण के लिए प्रतिक क्या होगा ? क्योकी भारत आज़ाद तो हो नही रहा है अमेरिका की तरह। 
चाहे जिस भी वज़ह से इंग्लैंड अब भारत का सत्ता भारतीयो को दे देना चाहता है। क्योकी अब खुद वह अपना देश संभाल नही पा रहा है। द्वितीय विश्व युद्ध ने इंग्लैंड की आर्थिक् हालत बदतर कर दी है और भारत में उसकी सेनाओं मे विद्रोह हो गया है। हालात 1857 जेसे ना हो अंग्रेजो के लिए, उन लोगों ने भारत सहित कुछ अन्य देश को भी सत्ता हस्तांतरित करने का फैसला बकायदा संसद ले लिया। इंग्लैंड अब तक भारत पर राज किया था अपनी सेना के द्वारा ही। सेना इंग्लैंड के साथ थी ज्यादा तन्ख्वाह और सुख सुविधा पाने से। अब सेना ही भड़क गयी थी। तो हट जाना ही बेहतर है। देश चाहता तो अंग्रेजो से सत्ता हस्तांतरित नही करवाता। सत्ता अपने दम पर ले लेता। मगर कांग्रेस आज़ादी के बजाय सत्ता हस्तांतरित होने में ही लगी थी। यह भी अंग्रेजो की चाल थी कांग्रेस के साथ की देश मे उसके खिलाफ़ बडा आन्दोलन होने से रह गया। अगर हो गया होता तो अन्ग्रेज यहा से बडे बेज़्ज़त होकर और अपना सब कुछ खोकर जाते।

        तब नेहरु ने राजगोपालचारी जी से इस बारे मे पुछा।राजगोपालाचारी दक्षिण के चोल राजाओं के कार्यक्रम में सेन्गोल को देखें थे। तो उन्होनें यह सुझाव दे दिया। साथ ही यह भी कह दिया की जिसने भी इसे धारण किया है वह लम्बे समय तक शासन किया है। नेहरु ने यह बात मान ली। दक्षिण के रीति रिवाज के अनुसार और राजाजी को Sengol बनाने का काम सौंपा गया। राजाजी ने थिरुवदुनथुराई अधीनम की मदद ली, जिन्होंने बदले में, 20वें गुरुमहा सन्निथानम श्री ला श्री अंबालावन देसिका स्वामीगल को इसे तैयार करने की जिम्मेदारी सौंपी। Sengol 5 फिट लम्बा 800 ग्राम सोने और चांदी से बनाया गया, जिसके ऊपर एक नंदी बनाया गया था। नंदी ‘न्याय’ के प्रतीक हैं, जो न्याय और निष्पक्षता के आदर्शों का प्रतिनिधित्व करता है।
इसके अतिरिक्त नंदी के नीचे वाले भाग में देवी लक्ष्मी व उनके आस-पास हरियाली के तौर पर फूल-पत्तियां, बेल-बूटे उकेरे गए हैं, जो कि राज्य की संपन्नता को दर्शाती हैं।

            राजदंड सबसे पहले लॉर्ड माउंटबेटन को थिरुवदुथुराई अधीनम के एक पुजारी द्वारा दिया गया था। फ़िर इसे वापस लेकर गंगाजल से शुद्ध किया गया। चोल काल के दौरान सत्ता के हस्तांतरण को शैव महायाजकों द्वारा इसे पवित्र किया गया। सी राजगोपालाचारी ने तब तमिलनाडु (तत्कालीन मद्रास प्रेसीडेंसी) में थिरुववदुथुराई अधीनम के नेता से ऐसा ही करने का अनुरोध किया था, ताकि अंग्रेजों से भारतीय हाथों को सत्ता सौंपी जा सके। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 14 अगस्त, 1947 की रात लगभग 10:45 बजे तमिलनाडु के अधिनाम के माध्यम से अपने घर पर स्थित कांग्रेस के अन्य नेताओं की उपस्थिति में सेंगोल  (Sengol) को स्वीकार कर लिया। जो अंग्रेजों से हमारे देश के लोगों के लिए सत्ता के हस्तांतरण का संकेत था। इस अवसर के लिए रचित एक विशेष गीत के गायन के साथ चोल-शैली के इस प्रतिक का जश्न मनाया गया। तमिल कवि संत थिरुगनासंबंदर ने कठिनाइयों को दूर करने के लिए प्रार्थना के रूप में सातवीं शताब्दी ई.पू. में रचित “कोलरू पधिगम” नामक छंद गाए। बाद मे इसे प्रयागराज स्थित संग्रहालय में नेहरु वीथिका में नेहरु जी की छडी के रुप मे

रख दिया गया। मै नही कहता की यह काम नेहरु जी ने किया।उनकी मृत्यू बाद बनी नेहरु वीथिका में नेहरु जी से सम्बंधित चीजों को रखा गया। जिसमें इसे नेहरु की छडी मान लिया गया। यह तो नेहरु जी के वंशजों को सोचना चाहिये था की 800 ग्राम सोने चांदी से बने 5 फिट लम्बा छडी कौन यूज़ करता है? अगर नही सोचना था तो अपने पुराने फोटोग्राफ्स document देख लेते जो नेहरु जी के घर ही पड़े थे। यह कांग्रेस के द्वारा किया गया एक घृणित काम है। प्रधानमंत्री मोदी के द्वारा पुन इसका मह्त्व दिया जाना उचित और सम्मानजनक काम है। 28 मई को इस सेंगोल को प्रयागराज के संग्रहालय से हटाकर एक बार फिर भारत की नवनिर्मित संसद में इसे स्थापित कर दिया गया। इस राजदण्ड का प्रयोग राजा द्वारा किया जाता था क्योंकि अतीत में भारत में राजतंत्र था।  लेकिन अब, चूंकि भारत एक लोकतंत्र है, यहां कोई भी व्यक्ति राजा नहीं है, भारत का संसद यहां का राजा है। इसलिए, यह सही है कि यह राजदंड एक संसदीय ताकत के पास होना चाहिए और ऐसा ही हो रहा है। कई लोग अफवाह फैला रहे हैं कि मोदी खुद को राजा मानते हैं इसलिए उन्होंने इस सेंगोल को अपने पास रखने का फैसला किया है। लेकिन इसमें कोई सच्चाई नहीं है। यह सेंगोल संसद में होगा और देश की सर्वोच्च सत्ता संसद के पास होती है।  प्रधानमंत्री संसद और भारतीय लोकतंत्र का सेवक होता है।

© बिमल तिवारी "आत्मबोध"  देवरिया उत्तर प्रदेश

आजकल औरतें || सुधा गोयल , कृष्णानगर , डा दत्ता लेन बुलंद शहर

 

आजकल औरतें

आजकल औरतें
लिख रही हैं कविताएं
अपने अनकहे
दर्द की व्यथाएं
जिसे अकेले ही
झेलती रही
ओंठो ही ओंठो में
सिसकती रहीं
आंसू पलकों में ठहरा लिए
जख्म अपने सहला लिए
बेख़ौफ़ सी अब वे
उन दर्दो को उघाड़ रही है
अपनी यातना की कहानी सुना रही है।
देह के अत्याचार
मानसिक बलात्कर
घर के नाम पर यातना गृह
पूरी जिंदगी झेलती नफरत
कुछ पल भी सुकून के
चुरा नहीं पाईं
सदा गरियाती और
लतियाती रहीं
चरित्रवान कभी नहीं रहीं
शक के दायरे में रहीं
उनकी देह को कोई भी
निगाहों में निरावरण करता रहा
देह देह नहीं
माटी की पुतली रही
कुछ औरतें ढ़ाल रही है
दर्द भरे शब्द
जो यहां वहां बिखरे हैं
जिनके हैं कुछ अर्थ
अब वे आंसू पीकर
जीना नहीं चाहती
बुझते चिरागों में
तेल डालती रही
खाद पानी देती रही।
औरतें सब जानती है
गांव की या शहर की
सुना रहीं हैं अपनी
अनकही कथाएं
अपनी व्यथाएं।

© सुधा गोयल
कृष्णानगर, डा दत्ता लेन बुलंद शहर-२०३००१

सूरज का दरवाजा खोला जाएगा || नेहा ओझा , देवरिया उत्तर प्रदेश

सूरज का दरवाजा खोला जाएगा

सूरज का दरवाज़ा खोला जाएगा।
जान गंवाकर भी सच बोला जाएगा।।

यहाँ शहीदों ने बोयी क़ुर्बानी है, 
इसीलिए लहराती धरती धानी है।
प्रेम के ढाई आखर सारे ग्रन्थों में
दोहों में हँसती कबिरा की बानी है। 

ऐसी माटी-बोली की अंगनाई में,
तन-मन-जीवन का रस घोला जाएगा।।

आग लगाने वाले दण्ड उठाएंगे,
बाहर या भीतर के हों, पछतायेंगे। 
कल तक बोते थे खेतों में, लेकिन अब,
उनकी छाती पर बन्दूक उगाएंगे। 

इन्क़लाब की आग अभी तक ज़िन्दा हैं,
इतिहासों से भी उठ शोला आएगा। 

सिंहासन पर रहने वालो! याद रहे,
देश प्रथम, कुर्सी की महिमा बाद रहे।
लोक-भाव के स्वाभिमान का मान रहे,
आज़ादी में देश सदा आज़ाद रहे।

हमें नहीं रूचि फ़िर से किसी गुलामी की,
सौदागर का सीना तोला जाएगा।।

© नेहा ओझा
देवरिया उत्तर प्रदेश

Saturday, October 22, 2022

आइए डिजिटल उपवास की ओर बढ़ते हैं !

 


आइए डिजिटल उपवास की ओर बढ़ते हैं!

हम और आप में से ज्यादातर लोग सोशल मीडिया के आदि हो रहे हैं। आज सोशल मीडिया का इस्तेमाल कुछ लोग दोस्त और रिश्तेदारों से जुड़ने के लिए कर रहे हैं, तो कुछ लोग वीडियो देखने के लिए। सोशल मीडिया हम सभी के लिए एक जाना पहचाना व लोकप्रिय माध्यम है। टेक्नोलॉजी और स्मार्ट उपकरणों के युग में आज नेटफ्लिक्स, अमेजॉन प्राइम और हॉटस्टार जैसे माध्यमों में फिल्म, वेब सीरीज आदि देखना और फेसबुक, टि्वटर पर स्क्रॉल करना हर उम्र के लिए एक आम बात हो गई है। यह इंसानी सभ्यता और अस्तित्व के लिए गंभीर चिंता का विषय है।

जबसे सोशल मीडिया आया है तब से हम अपने परिवार के साथ रहते हुए भी अलग-थलग महसूस करते हैं। सोशल मीडिया से युवाओं में अवसाद और डिप्रेशन का खतरा बढ़ रहा है, इसके साथ-साथ चिड़चिड़ापन भी दिखाई दे रहा है। हमारे समाज में सोशल मीडिया के आने के बाद लोगों में मोटापा, अनिद्रा और आलस्य की समस्या भी सामने आ रही है। कुछ रिसर्च बताते हैं कि सोशल मीडिया के आने के बाद से सुसाइड के मामले में बढ़ोतरी हुई है। सोशल मीडिया चेक ् और स्क्रोल करना, पिछले एक दशक के मुकाबले तेजी से लोकप्रिय गतिविधि बन गई है। सोशल मीडिया आज सभी देशों के लिए एक व्यावहारिक लत बन गई है।

आज फोन बड़े से लेकर बच्चों तक के लिए जरूरी हो गया है। जहां बच्चों की पढ़ाई ऑनलाइन हो रही है तो वही‌ बड़ों को अपडेट रखने के लिए फोन का इस्तेमाल करना पड़ रहा है। फोन का ज्यादा इस्तेमाल करने से लोगों में सोशल मीडिया की लत लग रही है। जिससे लोगों की नींद पर असर पड़ रहा है और नजरें तेजी से कमजोर हो रही है। नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ हेल्थ की एक रिपोर्ट के अनुसार अगर कोई व्यक्ति एक हफ्ते तक लगातार सोशल मीडिया का प्रयोग करता है, तो वह अपनी एक रात की नींद खो चुका होता है।

इसके अलावा हमारे युवाओं में ऑनलाइन सट्टेबाजी और ऑनलाइन खेलों में पैसा लगाने की लत भी सामने आ रही है। सोशल मीडिया के अत्यधिक उपयोग से हमारे युवाओं में ना सिर्फ आत्मविश्वास की कमी आ रही है, बल्कि अकेलेपन का भी आभास लगातार बढ़ता जा रहा है। सोशल मीडिया से सबसे अधिक प्रभावित हमारा युवा वर्ग हो रहा है। सोशल मीडिया के कारण आज कई युवा आत्महत्या कर रहे हैं तो कई युवा मानसिक अस्वस्थ का शिकार हो रहे हैं। यह समस्या आने वाले समय में और बढ़ने की ओर इशारा करती है।

लोग घंटों ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर फिल्म, वेब सीरीज, कॉमेडी इत्यादि चीजें देख रहे हैं। जिससे लोग अपने समय का सही से इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं। एक व्यक्ति तभी स्वस्थ होगा, जब उसे पर्याप्त आहार और नींद मिलेगी। हम सभी के सामने एक प्रश्न है- सोशल मीडिया से होने वाली समस्याओं से कैसे निपटा जाए ? जवाब- आज हमें कम से कम सप्ताह में एक या दो बार सोशल मीडिया फ्री दिवस या डिजिटल उपवास करने की जरूरत है। इसके अलावा हमें सोशल मीडिया का उपयोग उतना ही करना है, जितना वह हमारे लिए जरूरी है। अपने बच्चों को भी हमें सोशल मीडिया के खतरों व समस्याओं से रूबरू करवाना होगा और सोशल मीडिया के अत्यधिक उपयोग से रोकना होगा। कंपनियों, स्कूलों और सरकारी संस्थानों को भी हफ्ते में एक दिन मोबाइल फ्री डे मनाने की जरूरत है।

दीपक कोहली

भाटपार रानी के लाल ने किया कमाल,15वां रैंकिंग ला देवरिया जिले का नाम रोशन किया ।

 



डॉ कन्हैयालाल गुप्त किशन, संवाद सूत्र, भाटपार रानी, देवरिया, उत्तर प्रदेश।

भाटपार रानी के लाल ने उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग की परीक्षा में 15वां स्थान लाकर देवरिया जिले का नाम रोशन किया। रविशंकर प्रसाद गुप्त धर्मपत्नी श्रीमती निर्मला देवी के तृतीय सुपुत्र अभय कुमार गुप्त ; जिनका जन्म स्थान आर्य चौक भाटपार रानी है। वर्तमान में बेसिक शिक्षा परिषद, उत्तर प्रदेश में अध्यापन कार्य कर रहे थे।इनकी हाईस्कूल और इंटरमीडिएट की शिक्षा भाटपार रानी के बाबा राघव दास कृषक इंटरमीडिएट कॉलेज भाटपार रानी में हुई। स्नातक की शिक्षा भी यही मदन मोहन मालवीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय भाटपार रानी से हुई।ये नौकरी के साथ ही संघर्षपूर्वक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में जुटे हुए थे। इसके पूर्व भी ये एडीओ एलआईसी,एसआई सीपीओ, सचिवालय सहायक, बिहार और उत्तर प्रदेश लेखपाल की परीक्षाएं उत्तीर्ण की थी। इनके बड़े भाई श्री संतोष कुमार गुप्त उत्तर प्रदेश शिक्षा विभाग में एआरपी है।मझले भाई राजीव कुमार गुप्त एक प्रतिष्ठित व्यवसायी है।इनकी इस सफलता पर वेदप्रकाश वेद, दिनेश कुमार चौरसिया, विजय कुमार गुप्त, बद्रीनारायण गुप्त, संजय कुमार गुप्त,अजय कुमार गुप्त और रौनियार समाज ने हार्दिक शुभकामनाएं और बधाइयां दी है।

Monday, October 17, 2022

महाराजा हेमचंद्र विक्रमादित्य की जयंती व विजय दिवस पर रौनियार समाज के प्रतिभावानों को सम्मानित किया गया ।

समाज के विकास में रौनियार समाज की महत्वपूर्ण भूमिका , विजय कुमार गुप्ता

भाटपार रानी देवरिया ,

उपनगर के निर्मल मैरिज हाल में नगर रौनियार सेवा संघ के द्वारा रौनियार समाज के पुरोधा कुलभूषण महाराजा हेमचंद्र विक्रमादित्य की जयंती हर्ष उल्लास और उमंग के साथ नगर रौनियार सेवा संघ के द्वारा मनाया गया, सभा की अध्यक्षता श्री विजय कुमार गुप्त व संचालन महामंत्री व पत्रकार संजय कुमार गुप्ता ने किया कार्यक्रम की शुरुआत सभाध्यक्ष श्री विजय कुमार गुप्त ने मां सरस्वती के चित्र पर पुष्प अर्पित एवं दीप प्रज्वलित कर किया। माता सरस्वती पूजा का आवाहन गान अंतरराष्ट्रीय कवि एवं साहित्यकार डॉ कन्हैयालाल गुप्त किशन के हे शारदे मां, हे शारदे मां के गायन से हुआ। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि रौनियार महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष पारसनाथ रौनियार ने सभा को संबोधित करते हुए केंद्र के पिछड़े वर्ग की सूची में रौनियार समाज को शामिल करने के अपने अथक प्रयासों की चर्चा की और रौनियार समाज से भरपूर सहयोग मांगा। अंतरराष्ट्रीय कवि एवं साहित्यकार, पत्रकार डॉ कन्हैयालाल गुप्त किशन ने रौनियार समाज के पुरोधा महाराजा हेमचंद्र विक्रमादित्य के जीवन वृत्त पर प्रकाश डाला और वर्तमान परिपेक्ष में रौनियार समाज को एकजुट रहने का संकल्प दिलाया। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए सभा के अध्यक्ष विजय कुमार गुप्त ने कहा कि आज रौनियार समाज शिक्षा, स्वास्थ्य, कला, विज्ञान, चिकित्सा से लेकर राजनीति राजनैतिक क्षेत्रों में अपना परचम लहरा रहा है और रौनियार समाज किसी परिचय का मोहताज नहीं है बस अगर हम थोड़ा और संगठित होंगे तो निश्चित रूप से ही हमारी ताकत और हमारी शौर्य शक्ति की चर्चा नगर ही नहीं बल्कि पूरा देश करेगा। आज रौनियार समाज की ताकत को सभी पहचान रहे हैं और हमें अपने आने वाले पीढ़ी को सिर्फ जाग्रत करते रहना है , इस दौरान बच्चों ने अनेक सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए और उन्हें पुरस्कृत भी किया गया। इसके अलावा शिक्षा के क्षेत्र में, चिकित्सा के क्षेत्र में ,कला के क्षेत्र में, विज्ञान के क्षेत्र में ,समाज के क्षेत्र में, राजनीति के क्षेत्र में ,अपना योगदान देने वाले उपस्थित सभी पत्रकार बंधुओं को प्रशस्ति पत्र व शाल ओढ़ाकर उन्हें भी सम्मानित किया गया और अन्य समाज के तमाम अन्य सदस्यों को भी सम्मानित किया गया जिनमें मुख्य रुप से पारसनाथ गुप्ता, कृष्णा रौनियार, अंतरराष्ट्रीय कवि एवं साहित्यकार, पत्रकार डॉ कन्हैया लाल गुप्त किशन, बाबूलाल रौनियार, डॉ अरविंद प्रकाश, भगवान जी रौनियार, रजनी गुप्ता रोशन गुप्ता, रंजना गुप्ता, खुशबू गुप्ता, नीतू गुप्ता, सोनल रौनियार, राहुल गुप्ता, संतोष कुमार गुप्त,अभय कुमार गुप्त, कमलेश कुमार गुप्त,अजय कुमार गुप्त, राजेश कुमार गुप्त, आदित्य कुमार गुप्त,गौरव कुमार गुप्त,धुव कुमार गुप्त, जयप्रकाश रौनियार सहित अनेकों समाज सेवी व बच्चों के द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत करने वालों में राधिका गुप्ता, राधा गुप्ता, स्नेहा गुप्ता, प्रियांशु गुप्ता, दीप्ति गुप्ता, आराध्या, अनन्या, अंकित गुप्ता, सिद्धि गुप्ता, पायल कुमारी, आयुषी गुप्ता, अनुष्का, अमिताभ, ऐश्वर्या, आर्यन, डुग्गू सृष्टि, सौम्या गुप्ता, गौरी गुप्ता सहित तमाम लोगों को सम्मानित किया गया इस दौरान ध्रुव कुमार गुप्ता जितेंद्र गुप्ता मनोज कुमार गुप्ता कृष्णा रौनियार शारदा गुप्ता चंदन कुमार गुप्ता अजय आर्य आनंद प्रकाश रौनियार लल्लन प्रसाद रौनियार पप्पी जी रौनियार रामेश्वरम गुप्ता सुधीर गुप्ता प्रमोद कुमार गुप्ता पत्रकार ओम प्रकाश गुप्ता विश्राम प्रसाद गुप्ता रवि गुप्ता संदीप गुप्ता सोमनाथ गुप्ता, ओम नाथ गुप्ता, विजय कुमार गुप्ता सहित हजारों की संख्या में स्वजातीय बंधु उपस्थित रहे। सभी जनों का पूर्व नगर पंचायत अध्यक्ष श्रीमती प्रेमलता गुप्ता ने आभार व्यक्त किया।

Sunday, June 19, 2022

बाबूजी || वरुण प्रभात , झारखण्ड

 


आज पितृ दिवस है। पिता से अलग कुछ भी नहीं, कोई दिन कोई पल ऐसा नहीं जब वो न हो! फिर भी यह एकदिन अंतशः को खंगालने के लिए महत्वपूर्ण है। संबंधों के लिए,उन्हें यादगार बनाने के लिए, उन्हें याद करने के लिए जिसने भी इस दिवस की कल्पना की उसे सैल्यूट हैं। पितृ दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ।

बाबूजी

सोचता हूँ लिखूँ एक पाति बाबूजी को 
एक बाबा और एक आजी को
यूँ तो चलन में नहीं है लिखना पाति
ना ही सिचि जाती है अब संवेदना 
अंतर्देशीय पत्र पर
जाने क्यों आज 
फिर भी व्याकुल है मन लिखने को पाति 
बाबूजी को,बाबा को ,आजी को
लिखना चाहता हूँ उनके वंश बेल को, 
उनके बोये पेड़ को, तने को, शाखों को 
उस घर को उस आँगन उस द्वार को ,
संदूक,पटिहाट, मचिया दरवाजे पर घूमती वह उजली बछिया
लिखना चाहता हूँ उस सड़क को 
जिससे गुजरते हुए नहीं देखे वो विशालकाय हाथी 
या देखना नहीं चाहते थे अपने लक्ष्य से इतर वह कुछ भी
कहती है आज भी मास्टराईन आजी भाई जी संत थे
लिखना चाहता हूँ 
अब नहीं आती ससुरईतिन बेटियाँ आँगन में चहकने, खोईछा, सिन्दूर का अब उठ गया है रिवाज़ ,, 
अंकवार की खो गयी है परंपरा 
बिस्किट चाय ने स्वागत और विदाई का उठा लिया है ज़िम्मा 
अब रसोई से भूख नहीं डकार निकलता है
लिखना चाहता हूँ 
उदास हो गयी है अम्मा की आँखें 
भूल गई है हंसना 
अब वह बतियाती है अपने आप से 
मड़ुआ मकई तीसी मेथी सब हो गये हैं जैसे उसके लिए अपशगुन 
वह जिती है बीते दिनों में, आज गुजार रही हो जैसे
लिखना चाहता हूँ ताऊजी की खामोशी/अकेलापन असहज असहाय  
छूट गया है अधिकार जताने का वह आदत या टूट गया है बाजू ,मन
छोड़ आए हैं वह लहकती लकड़ियों के बीच 
केवल अपनों को नहीं अपने सपनें को भी 
अब उनकी आँखें नहीं चमकती
लिखना चाहता हूँ और भी बहुत कुछ 
झूठ फरेब धोखा बेईमानी  
वंश बेल के सड़े बीज को 
गाँव शहर देश दुनिया सबको
लिखना चाहता हूँ 
खुद को एक पाति बाबूजी की तरफ से।

वरुण प्रभात

                                       

पिता की छाया || बिमल तिवारी "आत्मबोध" देवरिया उत्तर प्रदेश


पिता मात्र एक शब्द नहीं सृष्टि औऱ संसार हैं

पिता की छाया संतानों पर अम्बर सा विस्तार हैं

ऊसर भूमि, परिवार का वृष्टि औऱ पालनहार हैं

पिता से हैं सम्बंध जीव का माँ की गोद से बाहर का

सम्यक जीवन जीने का दृष्टि औऱ संस्कार हैं


डूबती नैय्या भँवर में जब,तब पिता ही खेवनहार हैं

हर मुश्किल हर संकट में बच्चों के,पिता ही तारनहार हैं

पिता से ज्ञान जो मिलता उससे हिम्मत पौरुष हैं आता

ईश्वर सी हैं वाणी वचन ,पिता का बुध्दि व्यवहार हैं


पिता प्रत्यक्ष इस सृष्टि जगत में अप्रत्यक्ष का प्रमाण हैं

पिता सृष्टि के निर्माता औऱ देवों का अवतार हैं

पिता की वाणी वेद कुरान सी पावन औऱ पवित्र हैं

पिता के सिवा बच्चों ख़ातिर, नहीं दूसरा भगवान हैं


घर परिवार गृहस्थी का पिता ही संविधान हैं

खुलें हुए दर दरवाज़ें का पिता ही पहरेदार हैं

उमर अपनी थम जाती हैं देख पिता को साथ में

बुढ़ा पिता भी बैठा दर पर लगता थानेदार हैं 


बोली वचन औऱ वाणी घर में पिता का शासन हैं

डाँट डपट औऱ धौंस बच्चों पर पिता का प्रशासन हैं

बचा नहीं कोई नैतिकता जहाँ पर होता नहीं पिता

दृश्य अदृश्य रूप पिता का जीवन में अनुशासन हैं


पंगत रहन सहन पिता का नैतिकता का पाठ हैं

रंगत रूप रंग पिता का भौतिकता का साथ हैं

जिसकें अंग रूह में सारे परमात्मा का वास हैं

संगत साथ बात पिता का बौद्धिकता का ज्ञान हैं ।।

© बिमल तिवारी "आत्मबोध"  देवरिया उत्तर प्रदेश

Wednesday, March 23, 2022

शहीद-ए-आजम भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव

23 मार्च 1931 को क्रांतिकारी भगत सिंह, सुखदेव थापर और शिवराम राजगुरु को ब्रिटिश हुकूमत के दौरान फांसी की सजा सुनाई गई थी. तीनों ने लाला लाजपत राय का मौत का बदला लेने के लिए अंग्रेज पुलिस अधिकारी जेपी सांडर्स की हत्या कर दी थी. फांसी के समय आजादी के ये दीवाने बहुत कम उम्र के थे. इसके बाद से ही देश में 30 जनवरी के अलावा आज के दिन को भी शहीद दिवस के तौर पर मनाया जाता है।

देश में कई तारीखें शहीद दिवस के तौर पर मानी जाती हैं. इसमें महात्मा गांधी की हत्या के दिन यानी 30 जनवरी के बारे में अधिकतर लोग जानते हैं. इसके अलावा 23 मार्च को भी शहीद दिवस कहा जाता है क्योंकि इस रोज एक साथ तीन क्रांतिकारियों को लाहौर सेंट्रल जेल में फांसी दी गई थी. कई जगह इस बात का जिक्र है कि जिस दिन उन्हें फांसी दी गई थी उस दिन वो तीनों मुस्कुराते हुए आगे बढ़े और एक-दूसरे को गले से लगाया था।

देश-दुनिया के इतिहास में 23 मार्च की तारीख पर दर्ज अन्य महत्वपूर्ण घटनाओं का सिलसिलेवार ब्योरा इस प्रकार है

1880 : भारतीय स्वतंत्रता कार्यकर्ता बसंती देवी का जन्म।
1910: स्वतंत्रता संग्राम के सेनानी, प्रखर चिन्तक एवं समाजवादी राजनेता डॉ राममनोहर लोहिया का जन्म।
1931: भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के क्रांतिकारी भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को अंग्रेजों ने फांसी दी।
1940 : मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान प्रस्ताव को मंजूरी दी।
1956 : पाकिस्तान दुनिया का पहला इस्लामिक गणतंत्र देश बना।
1965: नासा ने पहली बार अंतरिक्ष यान ‘जेमिनी 3’ से दो व्यक्तियों को अंतरिक्ष में भेजा।
1986 : केन्द्रीय आरक्षी पुलिस बल की पहली महिला कंपनी दुर्गापुर शिविर में गठित की गई।
1987: बॉलीवुड फिल्म अभिनेत्री कंगना रनौत का जन्म।
1996: ताइवान में पहला प्रत्यक्ष राष्ट्रपति चुनाव हुआ, जिसमें ली तेंग हुई राष्ट्रपति बने।
2020 : भारत में कोरोना वायरस संक्रमण के मामलों की संख्या 433 हुई और देश के अधिकतर हिस्सों में लॉकडाउन लगाया गया।

Sunday, March 20, 2022

विश्व शांति .. होली || प्रीति शर्मा "असीम" नालागढ़ हिमाचल प्रदेश

 


विश्व शांति ....होली 

रंग जिंदगी का हिस्सा है।
 रंग -बिरंगी दुनिया में रंगों का अपना किस्सा है।
 क्यों ....हम विश्व शांति हेतु प्रयास नहीं कर पाए हैं ।
लाल रंग की प्यास में अपनी धरती को,
मनुष्यता के खून से लाल कर आए हैं ।

आओ सारे अपनी मेहनत से धरा को हरा-भरा बनाए।
 कोई पेट भूखा ना हो ।
विश्व से भुखमरी -लड़ाई -झगड़ा हटाएं।
 रंग -बिरंगे रंगों से विश्व के जन-जन को सजाएं।

 शांति रूप सफेद रंग का परचम हम लहराएं।
 युद्ध खत्म हो यूक्रेन- रूस का,
इस होली पर विश्व शांति होली दिवस मनाएं ।

स्वरचित रचना
 प्रीति शर्मा "असीम"
 नालागढ़ हिमाचल प्रदेश

Thursday, March 17, 2022

प्रेस वार्ता : अखिल भारतीय साहित्य परिषद् , जमशेदपुर


प्रेस वार्ता : अखिल भारतीय साहित्य परिषद् जमशेदपुर

                   दिनांक : 16 मार्च 2022 , स्थान : तुलसी भवन 

अखिल भारतीय साहित्य परिषद, जमशेदपुर इकाई के बैनर तले आज 16 मार्च दिन मंगलवार को एक प्रेस वार्ता सह संवाददाता सम्मेलन  का आयोजन तुलसी भवन , बिष्टुपुर , जमशेदपुर में संध्या 4:30 बजे किया गया l

प्रेस वार्ता को संबोधित करते हुए अखिल भारतीय साहित्य परिषद् के मीडिया प्रभारी श्री सूरज सिंह राजपूत जी ने आगामी 20 मार्च 2022 रविवार को तुलसी भवन के मुख्य सभागार में आयोजित होने वाले संस्था के भव्य वार्षिकोत्सव समारोह सह  वाग्धारा पत्रिका के लोकार्पण समारोह के संबंध में बताया l 

कार्यक्रम को मूलतः दो सत्रों में वर्गीकृत किया गया है , 

प्रथम सत्र में आदरणीया अनिता शर्मा जी के संचालन में "वाग्धारा पत्रिका एवं आदरणीय शैलेंद्र पांडे ' शैल ' जी के गज़ल संग्रह #चिरागों_में_चुपचाप_जलते_हुए का विमोचन तथा अतिथियों का सम्मान किया जाएगा । तथा दूसरे सत्र का आरंभ ओज के युवा कवि श्री सूरज सिंह राजपूत Er. Suraj Singh Rajput जी के संचालन से होगा जिसमें में भव्य कवि सम्मेलन का आयोजन किया जाएगा तथा सभी सदस्यों का सम्मान किए जाने का भी प्रस्ताव है ।

गौर तलब हो कि वार्षिकोत्सव  के अवसर आयोजित समारोह में केंद्रीय मंत्री 

माननीय अर्जुन मुंडा जी 

( जनजातीय कार्य मंत्री ,भारत सरकार ) जी मुख्य अतिथि के रूप  में उपस्थित रहेंगे 

विशिष्ठ अतिथि 

डॉ संजय पंकज, डॉ अनिल सिंह देव, ऋषि कुमार मिश्रा

सम्माननीय अतिथि

श्री गोविंद दोदराजका ,श्री इंदर अग्रवाल ,श्री दिनेश्वर प्रसाद सिंह दिनेश, श्री प्रसेनजीत तिवारी,श्रीमती मंजू ठाकुर

प्रेस वार्ता की इस अवसर पर संरक्षक श्री जयंत श्रीवास्तव , अध्यक्ष श्री शैलेंद्र पांडे शैल, संगठन मंत्री अनीता शर्मा , सचिव कल्याणी कबीर , उपाध्यक्ष राजेंद्र सिंह , कोषाध्यक्ष बसंत प्रसाद , मीडिया प्रभारी सूरज सिंह राजपूत , संतोष चौबे मामचंद अग्रवाल आदि उपस्थित थे।

आदरणीय जयंत श्रीवास्तव , अनीता शर्मा , शैलेंद्र पांडेय तथा कल्याणी कबीर जी ने आगामी कार्यक्रमों के विषय पर प्रकाश डाल ।

प्रेस वार्ता में समय देने के लिए तथा अपने समाचार पत्र में स्थान देने के लिए अखिल भारतीय साहित्य परिषद् शहर के तमाम प्रिंट एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के बंधुओं का तहे दिल से आभार व्यक्त करता है ।

Friday, February 4, 2022

मातु शारदे ! ऐसा वर दो , वसंत जमशेदपुरी

 


मातु शारदे! ऐसा वर दो |
ज्ञान-दीप अंतस में धर दो ||

नाश तिमिर का हो जाए माँ |
शोक हृदय का खो जाए माँ |
आक-बबूल भरे मरुथल को-
हे माँ!तुम चंदन-वन कर दो ||

गूँजे वेद-ऋचाएँ घर-घर |
प्रेम-समीर बहे माँ! सर-सर |
संबंधों में बढ़े मधुरता-
वाणी में अमरित-रस भर दो ||

टूटे मन के तार जोड़ मैं |
छंद रचूँ छल-छंद छोड़ माँ |
जहाँ प्रीति का निर्झर हो माँ-
वहीं एक छोटा सा घर दो ||

-वसंत जमशेदपुरी


बसंत ....नहीं आया , प्रीति शर्मा "असीम" नालागढ़ हिमाचल प्रदेश

 


इस बार बसंत नहीं आया।
धूमिल -धूमिल धरा पर छाया।

 बादल बरसे निसदिन - निसदिन.
भरे हृदय की व्यथा कोई समझ ना पाया ।

इस बार बसंत नहीं आया।
मौन प्रकृति व्यथा संग मरण सन थी।
कैसे गुंजन करते भंवरे बागों में,
जब कोई पुष्प ही खिल ना पाया।

इस बार बसंत नहीं आया।
जीवन की उमंगे उम्मीदें पिघली पल -पल।

जीवन को एक सजा -सा बिताया।
उम्मीदों -आशाओं से खिलते हैं उपवन।
ना चांद चमका ना कोई तारा आया।
धरती सूखा ना पाई अपनी सीलन को ।
इस बार पेड़ों का पत्ता ना कोई मुस्कुराया ।

इस बार बसंत नहीं आया।

 प्रीति शर्मा "असीम"
 नालागढ़ हिमाचल प्रदेश


Sunday, September 19, 2021

शीर्षक : दाग मेरे दामन पर होगा || गौरव हिन्दुस्तानी (बरेली, उत्तर प्रदेश )

 


शीर्षक : दाग मेरे दामन पर होगा

चाँद कहा था तुमको लेकिन
दाग मेरे दामन पर होगा,
क्यों साथ तुम्हारा दिया नहीं
मुझसे प्रश्न यही दुनिया का होगा ।

तुम हार रही हो मृत्यु से
मैं हार रहा हूँ जीवन से,
तुम खोज रहीं वियोग के अवसर
मैं ढूँढ रहा संयोग के अवसर ।
तुम डूब रही हो निशा स्वप्न में
मैं तैर रहा हूँ दिवा स्वप्न में,
हम दोनों की इस प्रीति में
बस इतना अंतर होगा ।
चाँद कहा था तुमको लेकिन
दाग मेरे दामन पर होगा।

तुम माँग रहीं मुझको शिव से
बनारस के हर मन्दिर में,
मैं माँग रहा तुम्हें कृष्ण से
बरेली के हर मन्दिर में,
तुम राधा-मीरा की उपमा हो
मैं उर्मिले-शकुन्तला उपासक हूँ,
तुम श्याम वर्ण की मेघा हो,
मैं, तुम्हें ताकता चातक हूँ
यह अमर प्रेम इस अन्तर्मन का
अब कभी नहीं ओझल होगा
चाँद कहा था तुमको लेकिन
दाग मेरे दामन पर होगा।

तुम कहतीं मुझको आभूषण
श्रृंगार समय सम्मुख दर्पण में,
मैं कहता तुमको अलंकार,
अपनी कविता, कहानी, लेखन में।
तुम याद मुझे करती हो हर क्षण
मैं भूल नहीं पाता तुम्हें इक क्षण,
तुम जल रहीं विरह व्याकुलता में
मैं बुझ रहा तुम्हारी चिन्ता में।
ऐसा प्रेमी युगल किसी युग में
कभी देखा-सुना नहीं होगा
चाँद कहा था तुमको लेकिन
दाग मेरे दामन पर होगा।

चाँद कहा था तुमको लेकिन
दाग मेरे दामन पर होगा।
क्यों साथ तुम्हारा दिया नहीं
मुझसे प्रश्न यही दुनिया का होगा ।


गौरव हिन्दुस्तानी
(बरेली, उत्तर प्रदेश )

Wednesday, September 1, 2021

समाचार || महिला काव्यमंच की ऑनलाईन काव्य गोष्ठी में बही कृष्ण रसधारा

महिला काव्य मंच की मासिक ऑनलाईन काव्य गोष्ठी ३१-८-२०२१ को सफलता पुर्वक आयोजित की गई।

सभी कवयित्रीयों ने अपने भावों से भाव विभोर कर दिया,कोई राधे को जिया तो किसीने बिरह का रस पिया, वही किसीने प्रभु को राधे ठकुरानी के लिए तड़पते किशन का आभास कराया,

योगिनी काजोल पाठक के संचालन में एवं विभा तिवारी जी इकाई अध्यक्षा के सानिध्य तले गोष्ठी सफल एवं लाजवाब रही!

अर्चना ओजस्वी जी ,बाल कवयित्री मुख्य अतिथी ,नीति तिवारी, विशिष्ट अतिथि विशी सिंह जी,  संगीता तिवारी,खुश्बू  उपाध्याय, शिल्पी शहडोली,योगिनी जौनपुरी,उपस्थित रहीं।

सुचनार्थ 

योगिनी काजोल पाठक इ.उपा.

विभा तिवारी जी-इ.अ.

महक जौनपुरी पुर्वी उ.प.अ.

 



Friday, August 27, 2021

कविता : तलाश || लक्ष्मी सिंह जमशेदपुर झारखंड

 

तलाश

जिंदगी के सफर में,

मंजिल की तलाश में,

चलते चलते इतनी दूर आ गई,

शायद अब मंज़िल मिल जाएगी - 2

मंज़िल तो मिली नहीं पर,

ठोकरे हजार लगे ।


कभी रिश्तों ने ठोकर मारे तो,

कभी अपने बन के लोगो ने ठोकर मारे।

अब तो आलम कुछ यूं है ,

जिन्दगी भी जिद पर आ गई है 

शायद उसे भी ठोकर मारनी है।


फिर भी मैं नहीं हूंगी हताश, 

तन में जब तक  है साँस 

तब तक,

मंजिल की तलाश में 

चलती जाऊँगी। 

हजार ठोकरे खाते हुए ।


अपने आस को कभी टूटने न दूँगी ,

इस आस के सहारे, 

भटकते भटकते, 

मुझे मेरी मंजिल मिल जाएगी,

खड़ी कहीं किसी राह पर 

मेरा इंतिजार करते हुए ।


लक्ष्मी सिंह

जमशेदपुर झारखंड

Tuesday, August 24, 2021

परिचय : संतोष कुमार चौबे || जमशेदपुर , झारखंड

 

नाम : संतोष कुमार चौबे

पिता : स्व. बशिष्ठ चौबे, टाटा स्टील, जमशेदपुर

माता : स्व. देवेंति देवी, गृहणी।

जन्म : 23. 01.1975

निवासी : बसंतपुर (मलमलिया), सिवान, बिहार 

जन्म व कर्मभूमि
मकान सं. 66/1/1, सड़क सं. 16, आदित्यपुर-2, जमशेदपुर-13, झारखंड-831013।

शिक्षा
1991 : मैट्रिक, के एम पी एम हाई स्कूल, जमशेदपुर।
1993 : आई एस सी (मैथ), के एम पी एम इंटर कॉलेज, जमशेदपुर।
1995 : सर्टिफिकेट कोर्स इन स्टेनोग्राफी और सेक्रेटेरियल प्रैक्टिस।
1998 : भारत सरकार, आयकर विभाग में आशुलिपिक के पद पर नियुक्त, हजारीबाग।
2007-2009 : बी.कॉम (एकाउंट्स), करीम सिटी कॉलेज, जमहेडपुर।
2010 : मॉस कम्युनिकेशन और जर्नलिज्म में डिप्लोमा, करीम सिटी कॉलेज, जमशेदपुर।
2020-22: मॉस कम्युनिकेशन में मास्टर डिग्री जारी है।।

वर्तमान पद : आयकर निरीक्षक, इंटरनल ऑडिट, जमशेदपुर। 

साहित्यिक अभिरुचि : कविता, कहानी, ग़ज़ल, दोहा आदि।।

प्रकाशित साझा संकलन
अंजुमन, इंदौर ( कविता संग्रह) ,
कोरोनाकाल, देवघर (कविता संग्रह ) 
काव्यसागर, देवघर (कविता संग्रह)

संस्थाओं से संबद्धता
सदस्य (वित् सलाहकार), अखिल भारतीय साहित्य परिषद , जमशेदपुर ईकाई।
प्रभारी, साहित्योदय, जमशेदपुर ईकाई।
सदस्य, कलम की सुगंध झारखंड, जमशेदपुर।

आलेख और कविताओं का निम्नलिखित पत्रिकाओं में प्रकाशन
जोहार झारखण्ड,
आयकर पत्रिका, रांची।
आयकर बिहार, पटना।

अन्य आयकर विभागीय पत्रिकाएं तथा स्थानीय समाचार पत्र, प्रभात खबर, हिंदुस्तान, दैनिक भाष्कर, उदितवानी, खबर मंत्रा आदि।

आकाशवाणी जमशेदपुर से कविता का प्रसारण कई बार हुआ है, 2018, 2020 और 2021 में। 

प्राप्त सम्मान
विभागीय सम्मान। विभागीय हिंदी पखवाड़े में कई बार भाषण, कविता, निबंध आदि के लिए पुरष्कृत हुए।