आपका हार्दिक स्वागत है !!

भगत सिंह
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भगत सिंह
भगत सिंह

“यदि बहरों को सुनाना है तो आवाज़ को बहुत जोरदार होना होगा”

“…व्यक्तियो को कुचल कर , वे विचारों को नहीं मार सकते।”

“निष्ठुर आलोचना और स्वतंत्र विचार ये क्रांतिकारी सोच के दो अहम् लक्षण हैं।”

“महान साम्राज्य ध्वंस हो जाते हैं पर विचार जिंदा रहते हैं।”

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Monday, January 25, 2021

सूरज सिंह राजपूत , संपादक राष्ट्र चेतना पत्रिका : मां भारती की आरती

मां भारती की आरती : मां भारती के वीर सपूतों को नमन

ना चरखे से , ना चमचे से
ना मीठी -  मीठी बोली से
है  आजादी ये मिली  हमें
कई रक्तपात की होली से

मां भारती की आरती , अद्भुत व अद्वितीय है वह आरती जिस आरती में मां भारती के वीर सपूतों ने तेल के जगह अपना लहू लगाया है, जिस आरती के दीप में बाती के स्थान पर मां भारती के वीर सपूतों ने अपना जीवन व जवानी लगाया है ।

अविस्मरणीय है वह आरती जिस आरती के आन खातिर मां भारती के वीर सपूतों ने अपने गले से फांसी को गौरवान्वित बना दिया , पूज्यनीय है मां भारती के वीर सपूत जिन्होंने गोली की औकात अपने सीने पर नापा हो, जिन्होंने तलवारों की धार को अपने गले से लज्जित कर दिया जिन्होंने मौत को मजबूर कर दिया कि वह अहंकार ना करें ।
इस धरती पर कोई तो है जिसके पास मौत का खौफ नहीं , बेशक मौत को अहंकार करने का सही वजह प्रदान किया हो ।
मैं नमन करता हूं उस माटी को जिस माटी के वीर सपूत ने मुट्ठी में मां माटी को भरके नमन करता है और खुद को कुर्बान कर देता है । ऐसे ही लाखों विचार मन में अपार हर्ष का संचार करते हैं, कभी-कभी जी मचलता है क्यों न स्वयं पर हंकार करूं क्यों ना खुद पर ..... क्यों ना ईश्वर का आभार व्यक्त करूं जिन्होंने मुझे इस माटी में जन्म देने योग्य समझा ..... !

जब जहन में आता है कि आज उन्हीं महापुरुषों, महाबलीदानियों, मां भारती के सच्चे पुत्रों पर राजनीति होने लगी है । मन कचोट नहीं लगता है उनके पक्ष में अभद्र शब्दों का प्रयोग शब्द जो स्वयं पर लज्जित होते रहे हैं शब्द जिन्होंने स्वयं पर ग्लानि महसूस किया होगा कि मैं शब्दकोश में आया ही क्यों ?
यह बातें सिर्फ कल्पना है आप ऐसा समझ सकते हैं किंतु मेरे शब्द कल्पना से कहीं परे है मुझसे और स्वयं से बात करते हैं अपने गलत प्रयोग पर प्रश्नवाचक चिह्न लिए मुझसे सवाल करते हैं और मैं उन्हें उत्तर ना दे पाता हूं तो चीख चीख कर कहते हैं तुम्हें मुझे प्रयोग करने का कोई अधिकार नहीं है अक्सर जवाब ना होने पर मैं शब्दों की कमी महसूस करता हूं कमी जो आज महसूस कर रहा हूं कमी , जो शायद महसूस करता रहूंगा ।

कुछ लोगों का विचार जो मुझे अक्सर को कचोटता है कि आप उनके पक्ष में तलवार लेकर खड़े क्यों नहीं हो जाते हैं, मैं हंसता हूं खुद पर और उनकी मानसिकता पर कि जिन्होंने हमें आजादी उपहार स्वरूप भेंट की हो क्या उनके स्वाभिमान की रक्षा तलवार से करें जिन्होंने तलवार की धार को जीभ से चाट कर तलवार की धार को ललकार हो , जिन्होंने शत्रुओं के शीश थोंकों में काटा हो , यह लोग उसके पक्ष में तलवार की बात करते हैं कितने पागल हैं सूर्य के सामने दीपक के लिए अधिकार की बात करते हैं ।

जय हिन्द जय भारत

जो मां माटी के ध्वजवाहक
जो  संघर्षों   की   भाषा  है
मैं  उन्हें  पूजता  हूं  मन  से
जो  क्रांति  की परिभाषा हैं

जो  जुगनू   की   रिहाई  में
सारे   सूरज   कटवा  आए
है स्वाभिमान सर्वोच्च सदा
देकर बलिदान  जता  आए

जो मातृ भूमि की रक्षा में
पार उम्र के जाते हैं
जो 80 के उम्र में आकर
वीरभद्र बन जाते हैं

जो रणचंडी अमित के प्यास को
अपना लहू पिलाते है
जो मां माटी के रक्षा में
हंसकरके शीश कटाए हैं

मैं इन वीरों के चरणों में
अपना शीश झुकाता हूं
मैं इन वीरो के चरण धुली को
अपने शीश सजाता हूं

सूरज सिंह राजपूत , संपादक राष्ट्र चेतना पत्रिका

Thursday, August 27, 2020

सूरज सिंह राजपूत ( जमशेदपुर , झारखण्ड ) : मैंने भूख लिखा

 

मैंने भूख लिखा

मैंने भूख लिखा

फिर भी
न लिख सका
वह ' भूख '
जो उसे लगी थी !
मेरे भूख में
बेरोजगारी
मंदी
समीक्षा
अशिक्षा का जिक्र था ।
उसके भूख में बस ' भूख ' !


मैंने भूख लिखा
फिर भी
न लिख सका
वह ' भूख '
जो उसे लगी थी !
मेरे भूख में
लाचारी
बंदी
परीक्षा
परिक्षा का जिक्र था ।
उसके भूख में बस ' भूख ' !


मैंने भूख लिखा
फिर भी
न लिख सका
वह ' भूख '
जो उसे लगी थी !
क्योंकि,
भूख लिखते वक्त
मैं ट्रेन के ए. सी. बोगी में था ।
वह भूखा प्लेटफार्म पर !
क्योंकि,
भूख लिखते वक्त
मैं अपने ए. सी. कार में था ।
वह भूखा सिग्नल पर !


मैंने भूख लिखा
फिर भी
न लिख सका
वह ' भूख '
जो उसे लगी थी !
क्योंकि,
मैंने भूख लिखना चाहा ।
उसने भूख मिटाना !
क्योंकि,
मेरे भूख से अलग थी ।
उसकी ' भूख ' !


- सूरज सिंह राजपूत

Sunday, August 23, 2020

कविता : आदमी कितना मजबूर है ( योगिनी काजल पाठक )


कविता: आदमी कितना मजबूर है

आदमी कितना मजबूर है !
ये कैसी उल्फत सफर-ए-जिन्दगी की
यहाँ तो बस नफरतों का सुरूर है,
अपनों से उलझे बेगानों से सुलझे,
इंसान तो बस दिखावे में ही चूर है
मयस्सर नही सुकून पल भर का
निमित्त है साँस लेने की,
रूक जाए तो कौन सम्भाले,
अभी तो चलना बहुत दूर है !
सचमुच,आदमी कितना मजबूर है !
तहजीब-ए-फितरत की दरकार सबसे
लेकिन खुद में सलीको की बिगड़ी दस्तूर है
बसीर-ए-खबर की आस ही नहीं,
अबतक जो मिला महज नकली नूर है !
सचमुच आदमी कितना मजबूर है !
एक ही मंजिल के रास्ते असंख्य,
फिर क्युँ,चढ़ा सबको ऐठन का फितूर है ?
जहाँ से आए हैं फिर वहीं पर जाना है !
सफर-ए-मंजिल अभी बहुत दूर है !
सच मुच आदमी कितना मजबूर है !

योगिनी काजल पाठक

Friday, August 21, 2020

भगवान श्री गणेश जी के 5 महामंत्र अर्थ सहित









महामंत्र : 1
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥

अर्थ - घुमावदार सूंड वाले, विशाल शरीर काय, करोड़ सूर्य के समान महान प्रतिभाशाली।
मेरे प्रभु, हमेशा मेरे सारे कार्य बिना विघ्न के पूर्ण करने की कृपा करें।

 महामंत्र : 2
विघ्नेश्वराय वरदाय सुरप्रियाय लम्बोदराय सकलाय जगद्धितायं।
नागाननाथ श्रुतियज्ञविभूषिताय गौरीसुताय गणनाथ नमो नमस्ते॥

अर्थ - विघ्नेश्वर, वर देनेवाले, देवताओं को प्रिय, लम्बोदर, कलाओंसे परिपूर्ण, जगत् का हित करनेवाले, गजके समान मुखवाले और वेद तथा यज्ञ से विभूषित पार्वतीपुत्र को नमस्कार है ; हे गणनाथ ! आपको नमस्कार है ।

महामंत्र : 3
अमेयाय च हेरम्ब परशुधारकाय ते ।
मूषक वाहनायैव विश्वेशाय नमो नमः ॥

अर्थ - हे हेरम्ब ! आपको किन्ही प्रमाणों द्वारा मापा नहीं जा सकता, आप परशु धारण करने वाले हैं, आपका वाहन मूषक है । आप विश्वेश्वर को बारम्बार नमस्कार है ।

महामंत्र : 4
एकदन्ताय शुद्घाय सुमुखाय नमो नमः ।
प्रपन्न जनपालाय प्रणतार्ति विनाशिने ॥

अर्थ - जिनके एक दाँत और सुन्दर मुख है, जो शरणागत भक्तजनों के रक्षक तथा प्रणतजनों की पीड़ा का नाश करनेवाले हैं, उन शुद्धस्वरूप आप गणपति को बारम्बार नमस्कार है ।
 

महामंत्र : 5
एकदंताय विद्‍महे। वक्रतुण्डाय धीमहि।
तन्नो दंती प्रचोदयात।।

अर्थ - एक दंत को हम जानते हैं। वक्रतुण्ड का हम ध्यान करते हैं। वह दन्ती (गजानन) हमें प्रेरणा प्रदान करें।

Saturday, September 14, 2019

हिंदी ( वसंत जमशेदपुरी )

हिंदी 

हिंदी ऐसी बोलिए,समझ सभी को आय।
हो भाषा सम्पर्क की,ऐसा करें उपाय।।

ऐसा करें उपाय,क्लिष्ट शब्दों को छाँटें।
जो हों सरल,सुपाच्य,उन्हें आपस में बाँटें।।

कह वसंत कविराय,बने माथे की बिंदी।
सब भाषा में श्रेष्ठ, तभी बन पाए हिंदी।।

© वसंत जमशेदपुरी

हिंदी गरिमामय भाषा है ( माधवी उपाध्याय )

हिंदी गरिमामय भाषा है।



हिंदी   गरिमामय   भाषा   है।
प्रतिपल  इसमे  जिज्ञासा  है।।
राष्ट्र   की   पहचान  है  हिंदी
जन जन को इससे आशा है ॥

सुलभ,सुघड़,मृदुभाषी हिन्दी ।
मधुर -मधुर भावो से भरकर,
हम सब को जोड़े है हिन्दी ।
नित विकास की अभिलाषा है।।

तुलसी, सूर, रहीम, मीरा  से ,
बहती काव्य की रसधारा  है।
महादेवी, निराला, दिनकर,से
हिंदी की अनुपम परिभाषा है।।

हिंदी भाषा में निहित सदा है।
अपनी संसकृति और धरोहर ।।
हिन्दी को सतत् प्रवाहित कर ,
विश्व-पटल पर लाने की प्रत्याशा है।।

संस्कार हमारा अपनी  हिंदी।
व्यवहार हमारा अपनी हिंदी।।
अक्षुण्ण रहे पहचान हमारी ।
हिंदी  देती यही दिलासा है ॥

© माधवी उपाध्याय




हिंदी हो ( सोनी सुगन्धा )

हिंदी हो


सकल संसार की भाषा में एक अधिकार हिंदी हो
सतत विस्तार कर रोजगार का आधार हिंदी हो ।

हमारे कर्म की हर साधना का  मन्त्र हिंदी हो
कि घर-घर में जुबानी हो कि हर व्यवहार हिंदी हो।

सभी भाषओं में दुल्हन सी सुंदर हिंदी भाषा है
सुसज्जित औ अलंकृत बिंदी का शृंगार हिंदी हो।

हमारे देश में इक हिंदी ही भाषा सरल हो जो
कि सबके भाव का निज कर रहा मनुहार हिंदी हो।

कबीरा जायसी रसखान मीरा   और कइयों की
अमरता लेख में मल्हार और उद्गार हिंदी हो।

हमारे देश का विज्ञान अनुसन्धान हिंदी हो
ये न्यायालय की भाषा हो सही व्यापार हिंदी हो।

ये भारत में नहीं भारत के हर लोगों में जिंदा हो
सकल सृष्टि में बोली का सदा प्रचार हिंदी हो।

सदा हिंदुत्व का तो आवरण हिंदी ही हिंदी हो
निरन्तर और सुचितर नित नया संचार हिंदी हो।


© सोनी सुगन्धा

मैं हिंदी हूँ (डॉ मनीला कुमारी )


 मैं हिंदी हूँ


मैं हिंदी हूँ l
देश की बिंदी हूँ l
मेरा जन्म विरोधों में हुआ है l
जन्म से ही मारने का जतन हुआ है  l

मैं तुलसी की बिरवा की भाँति -
हर भारतीय के घर और जुबां पर बसती रही हूँ l
स्वर और व्यंजन मेरे दो संतान हैं,
जिनसे मेरी पहचान है l

निज घर परायेपन का दंश मिला है l
यूँ तो मैं राजभाषा हूँ
पर साथ सौतन अंग्रेजी खड़ी है l
आम की भाषा बन संपर्क भाषा बनी हूँ l

ख़ास की भाषा न होने का दंश
सदा भुगतना पड़ा है l
प्राचीन और नवीन भाषा की कड़ी हूँ l
वैज्ञानिक हूँ, तकनीक को अभिव्यक्त करती हूँ

काव्य और साहित्य की भाषा हूँ l
अलंकार, रस, छंद में बहती हूँ l
भाव और ध्वनियों की स्वतंत्र अभिव्यक्ति हूँ l
देशी - विदेशी भाषाओं को समाहित किए हूँ l

अपनों की मानसिकता के कारण
अपने घर में अपमानित होती हूँ l
मेरे अपने मेरी सौतन का साथ देते हैं
और मुझको अपनाने से कतराते हैं l

मेरे अपनों के मन में भय है कि
कहीं मुझे अपनाने से उनका दबदबा न घट जाए l
मान और सम्मान में कमी न आ जाए l
इसलिए हिंदी माध्यम विद्यालय को
कभी उच्च दृष्टि से नहीं देखते हैं l

 © डॉ मनीला कुमारी

Monday, June 17, 2019

उड़ान - ( वीणा पाण्डेय भारती )

उड़ान

मैने पूजा की
अचर्ना की,और
भगवान प्रसन्न हुए।
बोले,
वत्सला,कुछ मागों।
अविलम्ब,मैंने मांग लिया
मुझे पंख चाहिए
भगवान तथास्तु बोल कर
तत्काल अन्तर्धान हो गए

मैने खुशी से सब को
बातें अपनी बतलायी
सबने मुझे मूर्ख समझा
और मेरी खिल्ली उड़ायी।
नासमझ!
मुझे हीं बुला लिया होता।
ऐशो-आराम की कुछ चीजें मांग लिया होता !
सब की सुन रही थी
और मन हीं मन
इन प्रश्नों का जाल बुन रही थी।

कब करेगा ये समाज
मेरे आन्तरिक गुणों का मूल्यांकन ?
नारी हूं मैं।
आकाश दिख रहा है
विस्तार देखना है
पंख मिल गये हैं
उड़ान भरना है।

वीणा पाण्डेय भारती