आपका हार्दिक स्वागत है !!

भगत सिंह
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“यदि बहरों को सुनाना है तो आवाज़ को बहुत जोरदार होना होगा”

“…व्यक्तियो को कुचल कर , वे विचारों को नहीं मार सकते।”

“निष्ठुर आलोचना और स्वतंत्र विचार ये क्रांतिकारी सोच के दो अहम् लक्षण हैं।”

“महान साम्राज्य ध्वंस हो जाते हैं पर विचार जिंदा रहते हैं।”

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Monday, January 11, 2021

सूरज सिंह राजपूत ( जमशेदपुर, झारखण्ड ) : कई भ्रम पाल बैठे हैं भ्रम ना होने के भ्रम में, कहीं खो गई है वो , बचाने के क्रम में !



सूरज सिंह राजपूत
कई भ्रम पाल बैठे हैं भ्रम ना होने के भ्रम में,
कहीं खो गई है वो , बचाने के क्रम में !

संस्कृति, संस्कृति जो लज्जित है अपने रक्षकों के कृत्य से कृत्य जो समाज पर एक धब्बा . . .।

शुरुआत कहां से करूं विडंबना है , क्यों न उस घटना से ही करूं जिस घटना ने मुझे यह लेख लिखने के लिए प्रेरित किया, पूजा विद्या की देवी मां शारदे की थी, मन श्रद्धा से ओतप्रोत था बस स्नान के उपरांत मैं अपने घर में माता की उपासना करने ही जा रहा था तब तक मेरे कानों में कुछ जोड़ों की आवाज सुनाई दी लोग “ उसे संगीत कह रहे थे संगीत जिसे सुनकर मैं लज्जित था अपने ही घर में परिवार के प्रत्येक सदस्य अपने कमरे में जाकर बैठ गए “

उस दिन कार्यालय न जाने के कारण मैं पूरा दिन स्वयं के साथ व्यतीत करने का निर्णय लिया बस मैं चल दिया सड़क की ओर, वह जोड़ों की आवाज जिसे लोग गाना कह रहे थे वह अभद्रता की कोई पराकाष्ठा थी, लज्जित हो रही थी मर्यादा स्वयं के सामने कहीं दुबक कर बैठे थे समाज के सभी शिक्षित लोग किसी ने विरोध करने की हिम्मत तक न दिखाई उन पढ़े लिखे लोगों में सम्मिलित था मैं भी और यह ग्लानि मुझे अंदर ही अंदर कुरेद रही है ।

विद्या की देवी मां शारदे की उपासना करने का न जाने यह कौन सा अनोखा ढंग है ?

उसी सड़क से गुजर रही थी कुछ बच्चियां कुछ बहने कुछ औरतें जो किसी की मां थी किसी की बेटी थी किसी की बहन थी जो सर नीचे किए चुपचाप गुजर गई उस बाजार से जहां अभद्रता का यह नाच हो रहा था शायद किसी ने महसूस नहीं किया कि हम देवी की उपासना कर रहे हैं करते भी कैसे ? 

उपासकों ने उपासना की विधि जो बदल रखी है , कुछ मदिरा में लिप्त थे, कुछ मदिरा ला रहे थे, कुछ मदिरा पी रहे थे, कुछ मदिरा पिला रहे थे पूजा पंडाल बनाकर जिन लोगों ने संस्कृति को बचाने की कोशिश की थी वहां कई प्रश्न खड़े थे , अपने अस्तित्व के तलाश में ।

क्या वह संस्कृति बचा रहे थे या संस्कृति को गंवा रहे थे ?

दृश्य यहीं पर नहीं ठहरा जब माता को विदाई दी जा रही थी तो लोग सड़कों पर गुलाल उड़ा रहे थे अभद्र भरे शब्द चिल्ला रहे थे न जाने वह क्या जता रहे थे माहौल गम का था वह किस बात का जश्न मना रहे थे, हां प्रशासन भी था पर कार्य कर रहा था या नहीं यह वही जाने ? 

कपड़े फाड़ कर यू सड़कों पर नाचना न जाने कौन सी संस्कृति की धरोहर है ?

मेरे समझ से परे है वह दृश्य जहां माता की मूर्ति किसी वाहन पर कहीं दूर खड़ी दिखाई दे रही थी और धुआं, पानी छोड़ने वाली एक वाहन लोग इसे डीजे सेट कहते हैं, वहां रौनक थी लोग नाच रहे थे उत्सव मना रहे थे ।
क्या हम संस्कृति को बचा रहे थे या संस्कृति को गंवा रहे थे ।
    हां, कहीं खो गई है वो , बचाने के क्रम में । 
    हां, संस्कृति के रक्षक आज भक्षक बन गए हैं ।
    हां, संस्कृति कराह रही है आज अपने रक्षकों के बीच । 
    हां, सभ्यता लज्जित है आज अपने रक्षकों के मध्य हां संस्कृति व सभ्यता आज अपना अस्तित्व खोने से डर रही हैं ।
हमें बदलनी होगी अपनी शैली अपनी आज कि उपासना विधि वरना बदल जाएगी सभ्यता व संस्कृति की परिभाषा ।

जय मां माटी , जय हिंद ,  जय भारत

सूरज सिंह राजपूत , जमशेदपुर, झारखण्ड 



सूचना : 

यह रचना राष्ट्र चेतना पत्रिका के 06 अंक में भी प्रकाशित की गई है ।
यह अंक  दिनांक 11 जनवरी 2021 , सोमवार को प्रकाशित हुआ था ।


धन्यवाद
सूरज सिंह राजपूत
संपादक राष्ट्र चेतना पत्रिका


Thursday, August 27, 2020

सूरज सिंह राजपूत ( जमशेदपुर , झारखण्ड ) : मैंने भूख लिखा

 

मैंने भूख लिखा

मैंने भूख लिखा

फिर भी
न लिख सका
वह ' भूख '
जो उसे लगी थी !
मेरे भूख में
बेरोजगारी
मंदी
समीक्षा
अशिक्षा का जिक्र था ।
उसके भूख में बस ' भूख ' !


मैंने भूख लिखा
फिर भी
न लिख सका
वह ' भूख '
जो उसे लगी थी !
मेरे भूख में
लाचारी
बंदी
परीक्षा
परिक्षा का जिक्र था ।
उसके भूख में बस ' भूख ' !


मैंने भूख लिखा
फिर भी
न लिख सका
वह ' भूख '
जो उसे लगी थी !
क्योंकि,
भूख लिखते वक्त
मैं ट्रेन के ए. सी. बोगी में था ।
वह भूखा प्लेटफार्म पर !
क्योंकि,
भूख लिखते वक्त
मैं अपने ए. सी. कार में था ।
वह भूखा सिग्नल पर !


मैंने भूख लिखा
फिर भी
न लिख सका
वह ' भूख '
जो उसे लगी थी !
क्योंकि,
मैंने भूख लिखना चाहा ।
उसने भूख मिटाना !
क्योंकि,
मेरे भूख से अलग थी ।
उसकी ' भूख ' !


- सूरज सिंह राजपूत

Saturday, August 22, 2020

सूरज सिंह राजपूत



नाम : 
सूरज सिंह राजपूत

पिता का नाम : 
श्री बृमोहन सिंह

माता का नाम : 
श्रीमती मंजू देवी

जन्म तिथि : 
1 जनवरी 1994

जन्म स्थान : 
बलिया, उत्तर प्रदेश

मोबाइल नं. : 
6201034573

ईमेल आईडी : 

साहित्यिक विधा : 
गीत, ग़ज़ल, कहानी

भाषा : 
हिंदी, अंग्रेजी, भोजपुरी, ओडिया

शिक्षा : 
B.Tech ( Computer science and engineering )

रोजगार : 
Software Engineer
संपादक : राष्ट्र चेतना पत्रिका
मीडिया प्रभारी : अखिल भारतीय साहित्य परिषद्, जमशेदपुर


प्रमुख कविताएं :

  • नारी शक्ति
  • मैं आज भी हूं तेरा
  • ऐसा कुछ यारो कर्म करो
  • ग्राम की शाम
  • तु कल्पना विहीन
  • शुरुआत
  • ये कैसी आजादी
  • मधु कलंक
  • कलम की क्रांति
  • बूंद की लहर
  • पापा
  • मैं लिखता नहीं
  • मां तुझे जो याद करता हूं
  • वाह पंक्षी
  • गुड़िया
  • इस बरस की होली
  • हार प्रिया
  • मैं कान्हा हूं तेरा मईया
  • तुम निराश मत होना
  • लत दौलत की
  • इस्क शुरुआत तुमने की
  • मै गरीब क्या खाना खाऊं
  • मां तो तेरी याद आती है
  • देश आजाद है
  • कहानी बने
  • शीत के सत्र में
  • लड़की जो थी
  • निशानी दे जाऊंगा
  • तेरे इश्क़ में
  • इश्क़ में इस कदर
  • बैक का सिलसिला
  • तुम हमें जानती
  • बस थोड़ा गरीब हो गया हूं
  • तो अलग बात थी
  • मेरी परी
  • वो तुम्ही हो परी
  • माजरा इश्क का
  • दोस्ती दिल - लगी
  • मै मीनाक्षी
  • स्वयं की बंदना
  • ऐ पगली तेरी यादों ने
  • तु जो ठुकरा गई थी
  • था प्रीत हमारा सरल सहज
  • दुर्लभ परिवेश
  • वर दे मां
  • मैं अपनो से लड़ता तो लड़तार भी क्या
  • पुत्र हुए भयभीत जहां

प्रमुख कहानियां :

Friday, January 24, 2020

सूरज सिंह राजपूत

Er. Suraj Singh Rajput
Director of Umeed Classes.
Founder & Editor of Rashtra Chetna Patrika.
Software Engineer.
Motivational Speaker.
Poet & Writter.
मीडिया प्रभारी अखिल भारतीय साहित्य परिषद, जमशेपुर.

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