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भगत सिंह
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“यदि बहरों को सुनाना है तो आवाज़ को बहुत जोरदार होना होगा”

“…व्यक्तियो को कुचल कर , वे विचारों को नहीं मार सकते।”

“निष्ठुर आलोचना और स्वतंत्र विचार ये क्रांतिकारी सोच के दो अहम् लक्षण हैं।”

“महान साम्राज्य ध्वंस हो जाते हैं पर विचार जिंदा रहते हैं।”

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Monday, February 15, 2021

ब्रजेन्द्र नाथ मिश्र ( जमशेदपुर , झारखंड ) : श्रृंखला : केशर की क्यारियों से , भाग – 4

श्रृंखला  : केशर की क्यारियों से 
भाग – 4

अब डेरे लौटने की जल्दी थी। हमलोगों को सुबह सात बजे ही पहलगाम के लिये प्रस्थान करना था। मैंने तो घोड़ा लेने का निर्णय ले लिया। पत्नी पुन: अपने धर्मार्थ कष्ट सहन में पुण्य अर्जन करने में प्रतिबद्ध दिखी। उन्होंने भी समूह के साथ पैदल उतरने का निर्णय लिया। मैं 4 सुबह बजे तक बाण गंगा के पास पहुँचा। वहां से औटो लेकर मैं अपने ठहरने के स्थान तक आ पहुँचा।

आते ही थोड़ी नींद ले लेनी चाहिये, सोचकर मैं सो गया। पत्नी करीब 6 बजे पहुँची । फिर उनका निर्णय मुझे कुछ अविवेक पूर्ण लगा था। आखिर उनलोगों को अर्धकुमारी यानी आधी उतरायी के बाद घोड़ा लेना ही पड़ा, अन्यथा सवेरे प्रस्थान में उनके कारण विलम्ब हो सकता था। 
जम्मु कश्मीर यात्रा वृतान्त, 25-05-2018, शुक्रवार, चौथा दिन, Day 4:
पत्नी सीधे तैयार होने चली गयी। वे तैयार होकर निकली, तो मैं तैयार हुआ। हमलोगों की पहलगाम की यात्रा 9 बजे सुबह से शुरु हुयी। हमलोग एक Cheverelette Tavera SUV पर सवार होकर उधमपुर, क़ाज़ीगुंड से होते हुये पहलगाम 6 बजे शाम को पहुँचे।
इस यात्रा में, चेननी- नसरी के पास नई बनी करीब नौ किलोमीटर लम्बी सुरंग, को पार करना एक नये तरह के अनुभव से गुजरना था।
इस सुरंग ने जम्मु के कटरा से श्रीनगर की 300 किमी दूरी को कम करके 250 किलोमीटर कर दिया है। हिमालय पर्वत के अन्दरूनी पहाड़ों को बेधकर इतनी बड़ी दो सुरंगों का निर्माण, तकनीक और निवेश के साथ दृढ़ इच्छा शक्ति का भी परिचायक है। ये दोनों सुरंगें हर 300 मीटर के बाद मानव निर्मित और डिज़ाइन की हुई गुफाओ से आपस में जुड़ी हुई हैं। शायद यह दक्षिण एशिया की अब तक की सबसे बड़ी सुरंग है। रामबाण जिले में यह सुरंग पटनी टॉप आदि सुन्दर परिदृश्यों वाले स्थानों को बिना प्रभावित किए बनाई गयी हैं।
इस सुरंग से करीब 44 एव्लान्च और लैन्ड स्लाईड वाले क्षेत्रों में आसन्न खतरों से भी बचाव हो सकेगा।
चेनाब नदी के किनारे-किनारे उंचे पहाडों को काटकर बने सर्पीले सड़क मार्ग से गुजरना भी नए ऐडवेंचर की तरह था। अभी इस सड़क को फ़ॉर लेन बनाने का कार्य जोरों पर है। इससे ड़ायवरसन की भरमार है। धूल उड़ाती हुयी तवेरा लेकर हमारे चालक तारिक भट्ठ सुकून के साथ गाड़ी आगे बढ़ाते रहे।
इसी में बनीहाल पास की जवाहर टनेल छोटी सुरंग (ढाई कीलो मीटर) को भी हमने पार किया। कहा जाता है कि सर्दियों में इस सुरंग का प्रवेश द्वार बर्फ से ढंक जाता है, जिसे हमेशा साफ करने के लिये मशीने लगी होती हैं। यह सुरंग कश्मीर घाटी का प्रवेश द्वार है। बनिहाल अब रेल लिंक से श्रीनगर से भी जुड़ गया है। काज़िगुन्ड कश्मीर घाटी का पहला छोटा शहर है।

इसी सड़क से होते हुए अगर सीधे चलें तो अनंतनाग, 20 किलोमीटर और श्रीनगर करीब 60 किलो मीटर है। अगर दाहिने मुड़ जाएँ, तो 40 किलो मीटर पर पहलगाम है।
हमलोग कटरा से 8 घन्टे की यात्रा के बाद शाम में पहलगाम पहुँचे। यह अनंतनाग जिले का एक तहसील है। इसकी समुद्र तल से उंचाई करीब 7200 फीट है। लिद्देर नदी के स्फटिक की तरह साफ जल ने हमलोगों का स्वागत किया।
वहां हमलोग लिद्देर नदी से सटे हुये एक रेसोर्ट में ठहरे। वहाँ मैं जिस कमरे में ठहरा था उसके ठीक पूर्व में उंचा पहाड़ था। सामने कल-कल, छल-छल करते हुए लिद्देर नदी बह रही है। वैसे यह मंजर बहुत सुन्दर है, लेकिन एक चिन्ता की बात है। इस स्फटिक जैसे स्वच्छ जल में जब इन रेसोर्ट से निकले कचरे के अवशेष नदी में घुलेंगें तो क्या नदी की स्वच्छता शाश्वत रह पायेगी?
 
26-05-2018, शनिवार, पांचवा दिन (Day 5)
  पहलगाम मेरी कश्मीर घाटी की यात्रा का पहला पड़ाव था। पता नहीं पहला पड़ाव था इसलिये या कुछ खास है इसकी निशब्द वादियों में, यह मेरा पहला प्यार भी बन गया। मैं बाद में सोनमर्ग, गुलमर्ग और श्रीनगर भी गया, लेकिन हर जगह प्रकृति के खुलापन में कुछ-न-कुछ बनावटीपन घुला हुआ लगा।  यहाँ की प्रकृति अभी तक बिल्कुल अपने वास्तविक स्वरूप में है ।
मैं जहाँ ठहरा हूँ, वह लिद्दर नदी के किनारे का एक रेसोर्ट है। मुझे संयोगवश वह कमरा मिला हुआ है, जहाँ से लिद्देर नदी का कल-कल स्वर सुनाई देता है। स्फटिक-सा साफ जल पत्थरों पर लगातार बहते-बहते उन्हें गोल बना देता है। उन्हीं पर फिसलती हुई नदी, एक रूहानी संगीत को स्वर देती हुई बही जा रही है। यह घाटी, जो ऊँचे-ऊँचे पहाड़ों से घिरी है, उनके शिखरों पर इस मौसम (मई के उत्तरार्द्ध) में भी बर्फ की चादर देखी जा सकती है। यही बर्फ पिघलती है और झरनों की शक्ल में पहाड़ों से नीचे उतरती है और एक साथ मिलकर नदी का आकार ले लेती है।  इस स्थान पर यह नदी बिल्कुल स्वच्छ और अप्रदूषित है, इसीलिये इसका सौन्दर्य अभी भी शाश्वत है, रूहानी है, आत्मिक है। 

श्रृंखला  : केशर की क्यारियों से 
भाग – 4
ब्रजेन्द्र नाथ मिश्र ( जमशेदपुर , झारखंड )

Thursday, February 11, 2021

ब्रजेन्द्र नाथ मिश्र ( जमशेदपुर , झारखंड ) : केशर की क्यारियों से

श्रृंखला  : केशर की क्यारियों से 
भाग – 3

वहाँ पहुँचते ही पता चला कि पर्ची मिलनी शुरु हो गयी है। काफी भीड़ इकट्ठी होनी शुरु हो गयी। वहाँ काऊंटर तक पहुंचने के काफी पहले से सिर्फ एक ही लाईन में घुसना था। उस जगह से लेकर पीछे एक किलो मीटर तक पहले दो लाईन, फिर चार - चार पंक्तियाँ बन गयीं। ऊपर चमकता सूरज आज आग बरसाने में कोई कमी नहीं रख रहा है। बच्चे, बूढे सबों की फिजिकल उपस्थिति जरूरी थी, इसलिये सारे पक्तिबद्ध थे। इतने में देखा गया कि एक बच्चा बेहोश हो गया। जो पुलिस सबों को डण्डे दिखाकर पंक्तिबद्ध करने में अपने ड्यूटी का मुश्तैदीपना दिखा रही थी, उसे उस बच्चे का बेहोश हो जाना दिख नहीं रहा था। हमारे प्रधान मन्त्री देश को स्वच्छता से लेकर देशभक्ति का मन्त्र पूरे देश को दे रहे हैं लेकिन तन्त्र अपने पुराने अंदाज में ही काम कर रहा है। मेरा सुझाव है कि देश की सारी पुलिस को कुछ दिन मिलिट्री कैम्प में ट्रेनिंग दी जानी चाहिये और उनकी बॉर्डर पर पोस्टिंग भी दी जानी चाहिये, तभी शायद उनमें देश भावना की समझ आ जाये। अन्यथा वे आम जन को वैसे ही समझते रहेंगें जैसे अंग्रेजों के जमाने की ब्रिटिश पुलिस फोर्स आम भारतीय को समझते रहे थे।

हमलोग अखिकार दो घन्टे लाईन में खड़े रहने के बाद करीब बारह बजे अपनी-अपनी पर्चियां लेकर डेरे पर आ गये। तय हुआ कि हमलोग नहा-धोकर यहीं से तैयार होकर तुरत वैष्णो देवी भवन की यात्रा शुरु करेंगें। मैने अपनी पत्नी और ग्रुप के साथ बाण गंगा प्रवेश द्वार तक पहुँचकर अपनी यात्रा करीब एक बजे अपराह्न शुरु कर दिये। 
यात्रा की चढ़ाई मेरे जैसे 65 वर्ष के थोड़े कमजोर घुटने वाले ब्यक्ति के लिये कठिन थी। मेरी पत्नी ने अन्य लोगों के साथ पैदल ही यात्रा करने की ठानी। मैं भी उनके साथ कदम से कदम मिलाकर करीब दो घन्टे चला होगा। इतने में मेरे घुटने जवाब देने लगे। मैने पत्नी को कहा, "क्या किया जाय?"
उन्होने कहा, "आप घोड़ा ले लीजिये।"
मैंने पूछा, "आप क्या पैदल जायेंगीं? "
उन्होने कहा, "जब तक चल सकूं, पैदल चलूंगी। नहीं, तो घोड़ा ले लूंगी।"

शायद वे समूह के अन्य लोगों के साथ देने की अहमियत से भी बंधी हुयी साथ चलने के निर्णय पर चल रही हों। या धर्मार्थ कार्यों में कष्ट सहन करने के संस्कारगत मान्यताओं से बंधे हुये भी उन्होने माता रानी के चरणों तक चरणों से ही जाने की कठिन व्रत- साधना पालन करने के प्रति प्रतिबद्धता का निर्वहण कर रही हो। अर्धकुमारी से चढ़ाई सीधी थी। उसमें थकावट ज्यादा महसूस होती है। 
इस तरह हम सभी लोग भवन के करीब 7 बजकर 30 मिनट शाम में पहुँच गये।

हमलोग कीमती और जरूरी समान जिसमें मोबाइल आदि चीजें थी,  रखने की जरूरत के लिये, लॉकर रुम के लिये कोशिश में लगे तो पता चला कि उसके लिये लम्बी लाईन लगी है। और शायद यह भी खबर आयी कि लॉकरों की संख्या भी खत्म हो गयी है। श्राईन बोर्ड की अब्यवस्था या ऐसी स्थिति को सम्भाल सकने की अक्षमता साफ - साफ दिख गयी। अब हमलोगों को अपनी योजना बदलने की जरूरत आ पड़ी।

निर्णय यह हुआ कि मैं और ललन जी सामान के साथ इन्तजार करेंगें और बाकी लोग पक्तिबद्ध हो गेट न 3 से प्रवेश करेंगें। इसी में मेरी पत्नी भी थी। इतने में देवी जी की आरती का समय हो गया। पूरी की पूरी पंक्ति का मूवमेंट भी रुक गया। पीछे के तरफ भीड़ भी बढ़ती जा रही थी। यह भीड़ अव्यवस्थित हो रही थी। पुलिस बल भी तैनात थी। लेकिन उससे ऐसी अव्यवस्था से निबटने के लिये पुलिस बल और श्राईन बोर्ड की किसी कार्य योजना का नहीं होना हम लोगों बहुत खला।
जब हम लोग इंतज़ार कर रहे थे, उस समय कुछ लोग अपनी परेशानी का बयान कर रहे थे, वहीं पर बैठे हुए एक बुजुर्ग जैसे सज्जन ने कहा, " भैया, जबतक आप यहाँ हैं, परेशानियों के बावजूद भी दर्शन किए, वे सारी परेशानियाँ यहीं तक याद रहेंगी। जब यहाँ से निकल जाओगे, यहाँ की सारी परेशानियाँ भूल जाओगे और सिर्फ याद रह जायेगा कि माता रानी के दर्शन हमने कर लिया है।" मुझे उनका यह वक्तव्य काफी सकारात्मक लगा।

हमलोगों के काफी इंतज़ार के बाद रात के 11 बजे वे लोग दर्शन के उपरांत वापस आये। आते ही पहली खबर मिली कि पत्नी के कान के एक तरफ का कर्णफूल किसी ने खींच लिया। इसपर अफसोस जाहिर करते हुए शोक मनाने का समय नहीं था। इसके बाद  करीब 45 मिनट में घुमावदार मार्ग से होते हुए देवी जी की पुरानी गुफा से होते हुए टनेल मार्ग पर जा पहुंचे। वहाँ दर्शन का लाभ लेकर हमलोग अपने समूह से आकर मिल गये।

फिर मिलेंगे केशर की क्यारियों से श्रृंखला के अगले भाग में , धन्यवाद

ब्रजेन्द्र नाथ मिश्र ( जमशेदपुर , झारखंड )